अक्सर आपराधिक मामलों में यह सवाल उठता है कि क्या नशे की हालत में किया गया कोई कार्य (act) अपराध की श्रेणी में आता है? क्या नशे को ढाल बनाकर कोई व्यक्ति कानूनी सजा से बच सकता है? इस विषय पर कानूनी स्पष्टता होना बेहद आवश्यक है। भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 में नशे (Intoxication) से संबंधित प्रावधानों को बहुत बारीकी से परिभाषित किया गया है। आपराधिक न्याय प्रणाली मुख्य रूप से नशे को दो श्रेणियों में देखती है: अनैच्छिक नशा (Involuntary Intoxication) और स्वैच्छिक नशा (Voluntary Intoxication)।
आइए समझते हैं कि BNS की धारा 23 और 24 के तहत इसके क्या नियम हैं
1. अनैच्छिक नशा (Involuntary Intoxication) - BNS धारा 23
(पूर्व में भारतीय दंड संहिता की धारा 85)
कानून उन लोगों को पूर्ण बचाव (General Exception) प्रदान करता है जो किसी अन्य की साजिश या धोखे का शिकार हुए हों। BNS की धारा 23 के अनुसार, यदि कोई कृत्य ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाता है जो नशे के कारण उस कृत्य की प्रकृति (Nature of the act) को समझने में असमर्थ है, या यह नहीं जानता कि वह जो कर रहा है वह गलत है या कानून के विपरीत है, तो उसे अपराध नहीं माना जाएगा।
बचाव के लिए मुख्य शर्तें
नशे की वस्तु (Substance) व्यक्ति को उसकी जानकारी के बिना (without his knowledge) दी गई हो।
या, नशे की वस्तु उसकी इच्छा के विरुद्ध (against his will / coercion) दी गई हो।
यदि यह अदालत में साबित हो जाता है कि व्यक्ति की मानसिक अक्षमता का कारण वह नशा था जो उसे धोखे से दिया गया था, तो वह व्यक्ति आपराधिक दायित्व (Criminal Liability) से पूरी तरह मुक्त हो जाता है।
2. स्वैच्छिक नशा (Voluntary Intoxication) - BNS धारा 24
(पूर्व में भारतीय दंड संहिता की धारा 86)
यदि कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से शराब पीता है या कोई अन्य नशा करता है और फिर कोई अपराध करता है, तो क्या कानून उसे कोई रियायत देता है? बिल्कुल नहीं।
BNS की धारा 24 स्पष्ट करती है कि यदि कोई अपराध ऐसा है जिसके लिए एक विशेष आशय (Specific Intent) या ज्ञान (Knowledge) की आवश्यकता होती है, और वह कृत्य किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया है जो स्वेच्छा से नशे में था, तो उसे उसी प्रकार उत्तरदायी माना जाएगा जैसे कि वह बिना नशे की (Sober) स्थिति में होता।
सरल शब्दों में, कानून यह मानकर चलता है कि अपनी मर्जी से नशा करने वाले व्यक्ति को अपने कार्यों के संभावित परिणामों का पूरा "ज्ञान" था। इसलिए, अपनी मर्जी से नशा करके यह दलील देना कि "मुझे याद नहीं मैंने क्या किया", अदालत में कोई कानूनी बचाव (Legal Defence) नहीं माना जाता है।
न्यायिक दृष्टिकोण और महत्वपूर्ण बिंदु (Judicial Perspective)
सबूत का भार (Burden of Proof): यदि कोई आरोपी धारा 23 का लाभ लेना चाहता है, तो यह साबित करने का भार (Burden of proof) उसी पर होता है कि उसे नशा धोखे से या जबरन कराया गया था। अदालत सामान्यतः यह मानकर चलती है कि व्यक्ति होश में था जब तक कि इसके विपरीत साबित न कर दिया जाए।
ज्ञान बनाम आशय (Knowledge vs. Intent): स्वैच्छिक नशे (धारा 24) के मामलों में, अदालत यह "उपधारणा" (Presumption) करती है कि व्यक्ति को कृत्य का ज्ञान था। हालांकि, किसी विशेष आपराधिक 'आशय' (Mens Rea) को साबित करने के लिए अदालत मामले की पूरी परिस्थितियों और तथ्यों का मूल्यांकन करती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
कानून का मूल उद्देश्य समाज की रक्षा करना और न्याय सुनिश्चित करना है। नशे का आवरण ओढ़कर कोई भी अपनी आपराधिक जिम्मेदारियों से नहीं बच सकता। भारतीय न्याय संहिता की ये धाराएं यह सुनिश्चित करती हैं कि धोखे का शिकार हुए किसी निर्दोष व्यक्ति को गलत सजा न मिले, लेकिन साथ ही जानबूझकर नशा करके कानून तोड़ने वालों को उनके किए की पूरी सजा मिले। कानूनी दृष्टिकोण से, अपनी सीमाएं जानना और स्वैच्छिक नशे के परिणामों के प्रति सचेत रहना ही सबसे बेहतर बचाव है।