चेक बाउंस (Cheque Bounce): धारा 138 NI Act की समय-सीमा और इसका कानूनी महत्व
June 23, 2026
व्यापार और लेन-देन में चेक (Cheque) का उपयोग एक आम बात है, लेकिन जब कोई चेक बाउंस हो जाता है, तो यह एक गंभीर कानूनी समस्या बन सकता है। नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (Negotiable Instruments Act - NI Act) की धारा 138 चेक बाउंस के मामलों से निपटने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कानूनी हथियार है।एक सफल कानूनी कार्यवाही के लिए इस धारा के तहत निर्धारित समय-सीमा (Timeline) का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है। यदि आप एक भी दिन की देरी करते हैं, तो आपका केस कोर्ट में खारिज हो सकता है।धारा 138 NI Act के तहत कानूनी प्रक्रिया और समय-सीमाचेक बाउंस होने पर आपको एक निश्चित क्रम में कानूनी कदम उठाने होते हैं। यहाँ पूरी प्रक्रिया की चरणबद्ध समय-सीमा दी गई है:1.चेक को बैंक में प्रस्तुत करना (Presentation of Cheque):चेक जारी होने की तिथि से 3 महीने के भीतर.चेक पर लिखी गई तारीख से 3 महीने (या चेक की वैधता अवधि, जो भी पहले हो) के भीतर उसे बैंक में क्लीयरेंस के लिए लगाना अनिवार्य है। जब चेक अपर्याप्त फंड (Insufficient Funds) या किसी अन्य कारण से वापस हो जाता है, तो बैंक आपको 'रिटर्न मेमो' (Return Memo) देता है।2.लीगल नोटिस भेजना (Sending Legal Notice):बैंक से रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिनों के भीतर.बैंक से चेक बाउंस होने की सूचना (Return Memo) मिलने के ठीक 30 दिनों के भीतर, चेक जारी करने वाले व्यक्ति (Drawer) को एक औपचारिक कानूनी नोटिस भेजना आवश्यक है। इस नोटिस में उसे चेक की राशि का भुगतान करने की मांग की जाती है।3.भुगतान के लिए समय देना (Waiting Period for Payment):नोटिस प्राप्त होने के बाद 15 दिन.लीगल नोटिस मिलने के बाद, चेक जारी करने वाले व्यक्ति को भुगतान करने के लिए 15 दिनों का कानूनी समय दिया जाता है। इस अवधि के दौरान आप न्यायालय में शिकायत दर्ज नहीं कर सकते।4.न्यायालय में शिकायत दर्ज करना (Filing the Complaint):15 दिन की अवधि समाप्त होने के 30 दिनों के भीतर.यदि वह व्यक्ति 15 दिनों के भीतर भुगतान नहीं करता है, तो 16वें दिन से आपका 'Cause of Action' (कार्रवाई का कारण) शुरू हो जाता है। अब आपको अगले 30 दिनों के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट के न्यायालय में धारा 138 के तहत आपराधिक शिकायत (Criminal Complaint) दर्ज करनी होगी।धारा 138 NI Act का महत्व (Importance)इस कानून का मुख्य उद्देश्य केवल देनदार को सजा दिलाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आपको आपका पैसा वापस मिल सके। इसके प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:व्यावसायिक लेन-देन में विश्वास (Trust in Commercial Transactions): यह धारा चेक की विश्वसनीयता को बनाए रखती है। इसके डर से लोग बिना बैंक खाते में पैसे हुए चेक जारी करने से बचते हैं।सख्त दंड का प्रावधान (Strict Penalties): चेक बाउंस साबित होने पर अदालत 2 साल तक की जेल, या चेक की राशि का दोगुना जुर्माना, या दोनों की सजा सुना सकती है। यह डर भुगतान को जल्दी सुनिश्चित करने में मदद करता है।त्वरित समाधान (Speedy Resolution): सामान्य दीवानी मुकदमों (Civil Suits) की तुलना में, धारा 138 के तहत आपराधिक मामले तेजी से चलते हैं (विशेषकर Summary Trial के माध्यम से), जिससे रिकवरी जल्दी होती है।समझौते की गुंजाइश (Scope for Settlement): कई मामलों में, जेल और भारी जुर्माने के डर से विपक्षी पार्टी कोर्ट के बाहर ही मामले का निपटारा (Compromise) करने और पैसे लौटाने के लिए तैयार हो जाती है।निष्कर्ष (Conclusion)चेक बाउंस के मामलों में "समय ही सब कुछ है" (Time is of the essence)। यदि आप निर्धारित समय-सीमा चूक जाते हैं, तो आपको सिविल रिकवरी सूट (Civil Recovery Suit) जैसे लंबे और जटिल रास्तों का सहारा लेना पड़ सकता है। इसलिए, चेक बाउंस होते ही बिना देरी किए सही कानूनी कदम उठाना बेहद जरूरी है।अधिक जानकारी, लीगल ड्राफ्टिंग और चेक बाउंस मामलों में विशेषज्ञ कानूनी सहायता के लिए www.vakeelSahab.in पर विजिट करें और अपनी समस्या का त्वरित समाधान पाएं।
लेखक / परामर्शदाता
Amardeep Jaiswal, Advocate High Court of Madhya Pradesh
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अस्वीकरण: यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है और इसे कानूनी सलाह नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी कानूनी मामले के लिए कृपया उचित परामर्श लें।