बच्चे की गवाही क्या कोर्ट में मान्य है? | Child Witness Law in India Explained
July 01, 2026
भारतीय समाज में यह धारणा आम है कि “बच्चे झूठ नहीं बोलते”, लेकिन अदालतें केवल भावनाओं पर नहीं बल्कि साक्ष्य और कानून के आधार पर निर्णय लेती हैं। ऐसे में सवाल उठता है—क्या किसी बच्चे की गवाही (Child Witness) कोर्ट में मान्य होती है?
इस लेख में हम Indian Evidence Act, महत्वपूर्ण केस लॉ और कोर्ट की प्रक्रिया के आधार पर इस विषय को विस्तार से समझेंगे।
क्या बच्चे की गवाही कानून में मान्य है?
हाँ, भारतीय कानून के अनुसार बच्चे की गवाही पूरी तरह मान्य है।
Indian Evidence Act, 1872 की धारा 118 के अनुसार:
कोई भी व्यक्ति गवाही देने के योग्य है, यदि वह:
पूछे गए प्रश्नों को समझ सकता हो
तार्किक और सही उत्तर देने में सक्षम हो
यहाँ उम्र (Age) नहीं बल्कि समझ (Competency) महत्वपूर्ण होती है।
Voir Dire Test क्या होता है?
जब बच्चा गवाह के रूप में प्रस्तुत होता है, तो कोर्ट पहले उसकी क्षमता की जांच करता है। इसे Voir Dire Test कहा जाता है।
इस प्रक्रिया में:
जज बच्चे से सामान्य सवाल पूछते हैं
सच और झूठ के अंतर को समझने की क्षमता जांची जाती है
उसकी मानसिक परिपक्वता का आकलन किया जाता है
यदि बच्चा सक्षम पाया जाता है, तो उसकी गवाही दर्ज की जाती है।
क्या शपथ (Oath) जरूरी है?
Oaths Act, 1969 के अनुसार:
यदि बच्चा शपथ का महत्व नहीं समझता, तब भी उसकी गवाही को अस्वीकार नहीं किया जाता, बशर्ते वह विश्वसनीय हो।
महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के निर्णय (Case Laws)
Rameshwar v. State of Rajasthan (AIR 1952 SC 54)
कोर्ट ने कहा कि यदि बच्चे की गवाही विश्वसनीय है, तो बिना corroboration के भी उस पर भरोसा किया जा सकता है।
Dattu Ramrao Sakhare v. State of Maharashtra (1997) 5 SCC 341
केवल उम्र के आधार पर बच्चे की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता।
Panchhi v. State of U.P. (1998) 7 SCC 177
कोर्ट ने कहा कि बच्चा tutoring का शिकार हो सकता है, इसलिए उसकी गवाही की सावधानीपूर्वक जांच आवश्यक है।
State of U.P. v. Ashok Dixit (2000) 3 SCC 70
यदि गवाही स्पष्ट और विश्वसनीय हो, तो उसी के आधार पर सजा दी जा सकती है।
क्या बच्चे की गवाही पर पूरी तरह भरोसा किया जा सकता है?
अदालत निम्न बातों की जांच करती है:
क्या बच्चा किसी के प्रभाव या दबाव में है
क्या गवाही स्वाभाविक है या रटी हुई लगती है
क्या cross-examination में बयान consistent है
यदि गवाही प्रभावित लगती है, तो उसका महत्व कम हो सकता है।
Corroboration (पुष्टि) की क्या जरूरत होती है?
कानून में यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन:
अदालतें अक्सर अतिरिक्त साक्ष्यों से पुष्टि देखती हैं
जैसे मेडिकल रिपोर्ट, परिस्थितिजन्य साक्ष्य या अन्य गवाह
यह न्याय की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए किया जाता है।
बच्चे की सुरक्षा के लिए क्या प्रावधान हैं?
विशेषकर POCSO Act, 2012 के तहत:
गवाही in-camera (बंद कमरे में) ली जाती है
बच्चे को मानसिक तनाव से बचाया जाता है
Friendly environment प्रदान किया जाता है
क्या केवल बच्चे की गवाही से सजा हो सकती है?
हाँ, यदि:
गवाही स्पष्ट और भरोसेमंद हो
उसमें कोई गंभीर विरोधाभास न हो
अदालत को वह स्वाभाविक लगे
तो केवल बच्चे की गवाही के आधार पर भी conviction संभव है।
निष्कर्ष
बच्चे की गवाही भारतीय कानून में पूरी तरह मान्य है, लेकिन इसे सावधानीपूर्वक परखा जाता है। अदालत का ध्यान इस बात पर होता है कि गवाही स्वतंत्र, सुसंगत और विश्वसनीय हो।
इसलिए, यदि किसी मामले में बच्चे की गवाही महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, तो सही कानूनी सलाह और रणनीति बेहद जरूरी हो जाती है।
लेखक / परामर्शदाता
Amardeep Jaiswal, Advocate High Court of Madhya Pradesh
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Disclaimer: This article is for educational purposes only and should not be considered legal advice.
अस्वीकरण: यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है और इसे कानूनी सलाह नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी कानूनी मामले के लिए कृपया उचित परामर्श लें।