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05 August 2026
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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अब हर दोषसिद्धि के खिलाफ अपील नहीं होगी! जानिए कब केवल Revision ही होगा एकमात्र कानूनी उपाय

भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में अपील (Appeal) और रिवीजन (Revision) दो अलग-अलग कानूनी उपचार (Legal Remedies) हैं। लंबे समय से यह विवाद बना हुआ था कि यदि ट्रायल कोर्ट (JMF…
Key Points / एक नज़र में
  • भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में अपील (Appeal) और रिवीजन (Revision) दो अलग-अलग कानूनी उपचार (Legal Remedies) हैं।
  • लंबे समय से यह विवाद बना हुआ था कि यदि ट्रायल कोर्ट (JMFC) किसी आरोपी को बरी कर दे और बाद में सेशंस कोर्ट अपील में पहली बार उसे दोषी ठहरा दे, तो क्या आरोपी को हाईकोर्ट में धारा 374 CrPC (अब…
  • इस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर सुप्रीम कोर्ट ने Vishnu Kumar Gupta v.

विस्तृत विश्लेषण

Legal Analysis • Vakeel Sahab

भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में अपील (Appeal) और रिवीजन (Revision) दो अलग-अलग कानूनी उपचार (Legal Remedies) हैं। लंबे समय से यह विवाद बना हुआ था कि यदि ट्रायल कोर्ट (JMFC) किसी आरोपी को बरी कर दे और बाद में सेशंस कोर्ट अपील में पहली बार उसे दोषी ठहरा दे, तो क्या आरोपी को हाईकोर्ट में धारा 374 CrPC (अब धारा 415 BNSS) के तहत अपील का अधिकार मिलेगा?

इस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर सुप्रीम कोर्ट ने Vishnu Kumar Gupta v. State of Madhya Pradesh & Another, 2026 INSC 770 में स्पष्ट कर दिया है। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार एवं न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी को हाईकोर्ट में दूसरी अपील का अधिकार नहीं होगा। उसका उचित वैधानिक उपाय केवल Criminal Revision होगा।

मामला क्या था?

मामले के तथ्य संक्षेप में इस प्रकार थे—

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

शिकायतकर्ता ने इस आदेश के विरुद्ध सेशंस कोर्ट में अपील दायर की।

सेशंस कोर्ट ने साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन किया और पहली बार आरोपी को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई।

आरोपी ने हाईकोर्ट में धारा 374 CrPC (धारा 415 BNSS) के अंतर्गत अपील दायर की।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह अपील विधि के अनुसार स्वीकार्य (Maintainable) नहीं है।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न

क्या सेशंस कोर्ट द्वारा अपील में पहली बार दी गई दोषसिद्धि के विरुद्ध हाईकोर्ट में धारा 374 CrPC (अब धारा 415 BNSS) के तहत अपील की जा सकती है?

सुप्रीम कोर्ट का उत्तर था—

"नहीं।"

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि—

अपील, ट्रायल की निरंतरता अवश्य होती है।

लेकिन अपीलीय न्यायालय (Sessions Court) ट्रायल कोर्ट नहीं बन जाता।

धारा 374 CrPC केवल उन दोषसिद्धियों पर लागू होती है जो ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई हों।

यदि सेशंस कोर्ट अपील में बरी के आदेश को पलटकर पहली बार दोषसिद्धि करता है, तो उसके विरुद्ध धारा 374 CrPC/धारा 415 BNSS के तहत दूसरी अपील का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है।

आरोपी के पास क्या विकल्प रहेगा?

ऐसी स्थिति में आरोपी के पास केवल—

Criminal Revision

दायर करने का अधिकार रहेगा।

अर्थात आरोपी हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका प्रस्तुत कर सकता है, जहाँ न्यायालय आदेश की वैधता, न्यायिक त्रुटि, अधिकार क्षेत्र और कानून के सही अनुप्रयोग की समीक्षा करेगा।

BNSS लागू होने के बाद क्या स्थिति है?

पुरानी CrPC की धारा 374 का स्थान अब धारा 415 BNSS ने ले लिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि BNSS लागू होने के बाद भी यही सिद्धांत लागू रहेगा। अर्थात केवल कानून बदलने से अपील का अधिकार स्वतः उत्पन्न नहीं हो जाता।

Arun Sharma मामले पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के Arun Sharma v. State of Himachal Pradesh के निर्णय में व्यक्त उस कानूनी दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया, जिसमें ऐसी परिस्थितियों में अपील को स्वीकार्य माना गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह व्याख्या विधि के अनुरूप नहीं थी।

इस निर्णय का व्यावहारिक महत्व

यह फैसला अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों, अभियोजन पक्ष तथा आम नागरिकों सभी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि—

अपील और रिवीजन के बीच का भ्रम समाप्त हो गया।

हाईकोर्ट में गलत प्रकार की अपील दायर होने की संभावना कम होगी।

अधिवक्ताओं को अब सही कानूनी उपचार चुनने में स्पष्ट मार्गदर्शन मिलेगा।

न्यायालयों का समय भी अनावश्यक मुकदमों में व्यर्थ नहीं होगा।

यदि आपके साथ भी ऐसा हो तो क्या करें?

यदि—

ट्रायल कोर्ट ने आपको बरी किया था,

लेकिन सेशंस कोर्ट ने अपील में पहली बार दोषी ठहरा दिया है,

तो बिना समय गंवाए किसी अनुभवी आपराधिक अधिवक्ता से सलाह लेकर Criminal Revision दायर करने की प्रक्रिया प्रारंभ करें। केवल "अपील" दायर कर देने से आपका मामला तकनीकी आधार पर खारिज हो सकता है।

निष्कर्ष

Vishnu Kumar Gupta v. State of Madhya Pradesh (2026 INSC 770) भारतीय आपराधिक न्यायशास्त्र का एक महत्वपूर्ण निर्णय है। इसने यह स्पष्ट कर दिया है कि सेशंस कोर्ट द्वारा अपील में पहली बार की गई दोषसिद्धि के विरुद्ध हाईकोर्ट में नियमित अपील का अधिकार उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में Revision Petition ही उचित वैधानिक उपाय है। यह निर्णय अपील और रिवीजन की सीमाओं को स्पष्ट करता है और भविष्य में समान मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में कार्य करेगा।

Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से लिखा गया है। प्रत्येक मामले के तथ्य अलग-अलग होते हैं। किसी भी कानूनी कार्रवाई से पहले योग्य अधिवक्ता से व्यक्तिगत कानूनी सलाह अवश्य लें।

Advocate Amardeep Jaiswal
About the Author / लेखक परिचय

Advocate Amardeep Jaiswal

Advocate, High Court of Madhya Pradesh, Jabalpur। भारतीय कानून, न्यायिक निर्णय और व्यावहारिक कानूनी विषयों पर जानकारीपूर्ण लेख प्रकाशित करते हैं।

Editorial note: यह लेख कानूनी जानकारी और जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित है। Judgment/official source उपलब्ध होने पर authoritative text के लिए मूल स्रोत को प्राथमिकता दें।
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