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MACT दावा कहाँ दायर करें? सुप्रीम कोर्ट का नया निर्णय—बीमा कंपनी के कार्यालय से अपने-आप क्षेत्राधिकार नहीं बनता

MACT दावा कहाँ दायर करें? सुप्रीम कोर्ट का नया निर्णय—बीमा कंपनी के कार्यालय से अपने-आप क्षेत्राधिकार नहीं बनता

September 22, 2026

मोटर दुर्घटना के बाद पीड़ित व्यक्ति और उसके परिवार के सामने इलाज, आय की हानि और न्याय पाने की कठिनाई एक साथ खड़ी होती है। मुआवजे के लिए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में आवेदन देना होता है, पर एक महत्वपूर्ण प्रारम्भिक प्रश्न रहता है—दावा किस शहर या जिले के MACT में प्रस्तुत किया जाए?

सुप्रीम कोर्ट ने K. Rashik बनाम National Insurance Company Ltd. एवं अन्य, सिविल अपील क्रमांक 10706/2026, निर्णय दिनांक 16 सितम्बर 2026 [2026 INSC 996] में इस प्रश्न को स्पष्ट किया है। न्यायालय ने कहा कि केवल इस कारण कि बीमा कंपनी का कार्यालय या शाखा किसी शहर में है, उस शहर के MACT को दावा सुनने का क्षेत्राधिकार स्वतः नहीं मिल जाता।

मामले में क्या हुआ था?

दुर्घटना आंध्र प्रदेश के तिरुपति जिले में हुई थी। मूल दावा-याचिका में दावाकर्ता का पता चित्तूर, आंध्र प्रदेश का था और वाहन चालक भी वहीं का निवासी बताया गया था। याचिका में चेन्नई में दावाकर्ता के निवास अथवा व्यवसाय का कोई स्पष्ट अभिवचन नहीं था। फिर भी दावा चेन्नई MACT में दायर किया गया, मुख्यतः इस आधार पर कि बीमा कंपनी का कार्यालय चेन्नई में था।

बीमा कंपनी ने शुरुआत में ही चेन्नई MACT के क्षेत्राधिकार पर आपत्ति ली। ट्रिब्यूनल ने आपत्ति अस्वीकार कर दी, लेकिन मद्रास हाईकोर्ट ने मामला चेन्नई से चित्तूर स्थानांतरित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।

मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166(2) क्या कहती है?

मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166(2) पीड़ित/दावाकर्ता को दावा प्रस्तुत करने के लिए विकल्प देती है। दावा निम्न स्थानों में से उचित MACT में दिया जा सकता है:

जहाँ दुर्घटना हुई हो;

जहाँ दावाकर्ता निवास करता हो;

जहाँ दावाकर्ता व्यवसाय करता हो; अथवा

जहाँ प्रतिवादी निवास करता हो।

इस प्रावधान को ध्यान से पढ़ना आवश्यक है। दावाकर्ता के लिए कानून ने “निवास करता है या व्यवसाय करता है” शब्द प्रयोग किए हैं, लेकिन प्रतिवादी के लिए केवल “निवास करता है” कहा है। प्रतिवादी के “व्यवसाय करने” का स्थान धारा 166(2) में शामिल नहीं है।

बीमा कंपनी की शाखा या कार्यालय क्यों पर्याप्त नहीं है?

इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि धारा 166(2) में प्रयुक्त “प्रतिवादी” शब्द का अर्थ सामान्यतः दोषी वाहन का मालिक और/या चालक है; इसमें बीमा कंपनी को शामिल नहीं माना जा सकता।

कारण यह है कि बीमा कंपनी को हर दावा याचिका में प्रतिवादी बनाना अनिवार्य नहीं है। अधिकरण उसे विधि के अनुसार नोटिस दे सकता है। इसलिए बीमा कंपनी के मुख्यालय या शाखा का किसी शहर में होना, अपने-आप उस शहर के MACT को क्षेत्राधिकार नहीं देता।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 166(2) की भाषा CPC की धारा 20 से अलग है। CPC की धारा 20 में जहाँ प्रतिवादी व्यवसाय करता है, वहाँ वाद दायर करने का प्रावधान हो सकता है; पर MACT दावों के लिए विशेष कानून अर्थात धारा 166(2) लागू होगी। विशेष प्रावधान को सामान्य CPC नियम के सहारे विस्तृत नहीं किया जा सकता।

पॉलिसी वाली शाखा को पक्षकार बनाएं या बीमा कंपनी के हेड ऑफिस को?

यहाँ एक व्यावहारिक अंतर समझना आवश्यक है। बीमा कंपनी की स्थानीय शाखा, पॉलिसी जारी करने वाली शाखा, डिवीजनल/रीजनल कार्यालय और मुंबई जैसे स्थान का पंजीकृत मुख्यालय अलग-अलग कानूनी व्यक्ति नहीं हैं। वे सभी एक ही कंपनी के कार्यालय हैं। इसलिए उन्हें अलग-अलग प्रतिवादी बनाने की आवश्यकता नहीं है।

याचिका में प्रतिवादी एक ही रहेगा—“X Insurance Company Limited”। उसके बाद नोटिस और सेवा की सुविधा के लिए कंपनी को उस शाखा/डिवीजनल कार्यालय के प्रबंधक के माध्यम से वर्णित किया जाए जिसने पॉलिसी जारी की है अथवा जो उस पॉलिसी का दावा संभालता है। पॉलिसी पर अंकित जारीकर्ता कार्यालय का पता सबसे उपयोगी रहता है।

उदाहरण:

“प्रतिवादी क्रमांक 3—X Insurance Company Limited, वाहन क्रमांक … की बीमाकर्ता, अपने शाखा/डिवीजनल प्रबंधक के माध्यम से, पॉलिसी जारीकर्ता/क्लेम-सर्विसिंग कार्यालय, पता … । पंजीकृत कार्यालय: मुंबई, पता … ।”

यदि पॉलिसी जारीकर्ता शाखा और क्लेम-हब अलग हों, अथवा शाखा बंद हो चुकी हो, तो कंपनी को एक ही प्रतिवादी रखते हुए दोनों पतों पर नोटिस की प्रार्थना की जा सकती है। इससे नोटिस की सेवा में देरी या आपत्ति की संभावना कम होती है।

परंतु यह केवल नोटिस की सेवा की व्यवस्था है, क्षेत्राधिकार का आधार नहीं। मुंबई के हेड ऑफिस को प्रतिवादी बनाना, अथवा स्थानीय शाखा को याचिका में अंकित करना, अपने-आप मुंबई या उस स्थानीय स्थान के MACT को क्षेत्राधिकार नहीं देता। क्षेत्राधिकार का प्रश्न धारा 166(2) के स्वतंत्र मानदंडों से ही तय होगा।

बीमा कंपनी क्षेत्राधिकार की आपत्ति उठा सकती है

अक्सर यह तर्क लिया जाता है कि बीमा कंपनी केवल पॉलिसी-रक्षा वाले सीमित आधारों पर ही प्रतिवाद कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्थिति स्पष्ट की है:

यदि बीमा कंपनी केवल धारा 149(2) के अंतर्गत नोटिस-प्राप्त पक्ष है, तो उसकी प्रतिरक्षा के अधिकार सीमित हो सकते हैं।

लेकिन यदि दावाकर्ता स्वयं बीमा कंपनी को दावा याचिका में पार्टी-प्रतिवादी बनाता है, तो वह क्षेत्राधिकार सहित सभी विधिसम्मत आपत्तियाँ उठा सकती है। ऐसी स्थिति में उसे धारा 170 के अंतर्गत पृथक अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती।

इस सिद्धांत के लिए न्यायालय ने United India Insurance Co. Ltd. v. Shila Datta का सहारा लिया। इसलिए दावा-पत्र तैयार करते समय पक्षकारों के विवरण और चुने गए MACT का कानूनी आधार विशेष सावधानी से लिखना चाहिए।

शुरू में आपत्ति और अवार्ड के बाद आपत्ति में अंतर

निर्णय का दूसरा व्यावहारिक पहलू यह है कि क्षेत्राधिकार की आपत्ति किस चरण में उठाई गई है।

यदि बीमा कंपनी या अन्य प्रतिवादी, दावा शुरू होते ही MACT के समक्ष क्षेत्राधिकार की आपत्ति उठाता है, तो अधिकरण को धारा 166(2) की शर्तों को कठोरता से देखना होगा। यदि दुर्घटना, दावाकर्ता का निवास/व्यवसाय और वास्तविक प्रतिवादी का निवास उस MACT की सीमा में नहीं है, तो याचिका वहाँ नहीं चलनी चाहिए।

इसके विपरीत, यदि पूरा मुकदमा चल चुका है और अवार्ड पारित हो चुका है, तब अपील में केवल क्षेत्राधिकार का मुद्दा उठाना पर्याप्त नहीं होगा। CPC की धारा 21(1) के अनुसार आपत्ति लेने वाले पक्ष को यह दिखाना होगा कि आपत्ति प्रथम उपलब्ध अवसर पर उठाई गई थी—और जहाँ मुद्दे तय हुए हों, उनके तय होने से पहले अथवा उसी समय उठाई गई थी—तथा गलत क्षेत्राधिकार में सुनवाई होने से वास्तव में “न्याय की विफलता” (failure of justice) हुई है।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने पुराने निर्णयों—Mantoo Sarkar, Malati Sardar और Balveer Batra—को अलग परिस्थितियों वाला बताया। उन मामलों में विवाद बाद के चरण या अपीलीय स्तर पर था; जबकि K. Rashik के मामले में बीमा कंपनी ने आरंभ में ही आपत्ति ले ली थी।

दावा-पत्र में क्षेत्राधिकार का पैरा कैसे लिखा जाए?

याचिका में एक अलग, स्पष्ट पैरा होना चाहिए जिसमें यह बताया जाए कि संबंधित MACT को अधिकार क्यों है। उदाहरण के लिए:

“यह माननीय अधिकरण क्षेत्राधिकार रखता है क्योंकि दुर्घटना दिनांक … को थाना …, जिला … की स्थानीय सीमा में हुई थी / आवेदक स्थायी रूप से … में निवास करता है / आवेदक … में विधिवत व्यवसाय करता है, अतः मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166(2) के अंतर्गत यह दावा प्रस्तुत किया जा रहा है।”

तथ्य के अनुरूप इनमें से केवल सही आधार ही लिया जाए। गलत या अस्पष्ट अभिवचन से प्रारम्भिक आपत्ति, अनावश्यक स्थानांतरण और मुआवजे में विलंब हो सकता है।

निष्कर्ष

मोटर वाहन अधिनियम लाभकारी कानून है और पीड़ित को मुआवजा दिलाने के उद्देश्य से बनाया गया है, किंतु लाभकारी व्याख्या का अर्थ यह नहीं कि धारा 166(2) की स्पष्ट सीमाएँ समाप्त हो जाएँ। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद नियम साफ है—MACT दावा दुर्घटना स्थल, दावाकर्ता के वास्तविक निवास या व्यवसाय स्थल, अथवा वाहन के मालिक/चालक जैसे वास्तविक प्रतिवादी के निवास वाले क्षेत्र में दायर करें; केवल बीमा कंपनी के कार्यालय वाले शहर में नहीं।

सही क्षेत्राधिकार का चयन शुरुआत में ही करने से समय, खर्च और स्थानांतरण की प्रक्रिया से बचा जा सकता है तथा पीड़ित को मुआवजे की सुनवाई शीघ्र मिल सकती है।

क्लेमेंट के अधिवक्ता के लिए आवश्यक सावधानियाँ

पहले क्षेत्राधिकार तय करें, फिर याचिका तैयार करें: दुर्घटना-स्थल, क्लेमेंट के वास्तविक निवास/व्यवसाय और वाहन के मालिक/चालक के निवास का दस्तावेजी मिलान करें। बीमा कंपनी के कार्यालय को क्षेत्राधिकार का आधार न मानें।

दावा-पत्र में स्पष्ट अभिवचन करें: केवल यह न लिखें कि “इस माननीय अधिकरण को क्षेत्राधिकार है।” यह भी लिखें कि धारा 166(2) का कौन-सा आधार लागू है और उसके तथ्य क्या हैं। बाद में दिए गए तर्क से मूल याचिका में छूटा हुआ क्षेत्राधिकार-आधार पूरा नहीं हो जाता।

निवास का प्रमाण संलग्न करें: यदि दावा क्लेमेंट के निवास के आधार पर दायर है, तो आधार, मतदाता पहचान-पत्र, राशन कार्ड, किरायानामा, बिजली बिल या रोजगार रिकॉर्ड में से उपयुक्त दस्तावेज लगाएँ। अस्थायी या कृत्रिम पता गंभीर आपत्ति का कारण बन सकता है।

व्यवसाय-स्थान का ठोस आधार रखें: व्यवसाय के स्थान के आधार पर दावा हो तो नियुक्ति-पत्र, वेतन पर्ची, दुकान पंजीयन, GST/व्यापार दस्तावेज या अन्य विश्वसनीय सामग्री से उसे सिद्ध करने की तैयारी रखें।

मालिक और चालक का सही पता लें: RC, ड्राइविंग लाइसेंस, FIR, पुलिस दस्तावेज तथा बीमा पॉलिसी से पता मिलाएँ। अनुमानित या अपूर्ण पते से नोटिस-सेवा और क्षेत्राधिकार दोनों में समस्या आ सकती है।

बीमा कंपनी को एक ही प्रतिवादी रखें: कंपनी का सही कॉर्पोरेट नाम, पॉलिसी क्रमांक, पॉलिसी अवधि तथा बीमित वाहन का विवरण पॉलिसी से लें। पॉलिसी-जारीकर्ता/क्लेम-सर्विसिंग शाखा का पता दें तथा आवश्यक होने पर पंजीकृत कार्यालय का पता भी सेवा हेतु लिखें; शाखा और हेड ऑफिस को अलग-अलग प्रतिवादी न बनाएं।

नोटिस की वैकल्पिक सेवा की प्रार्थना करें: पॉलिसी शाखा, क्लेम कार्यालय और पंजीकृत कार्यालय में से उपलब्ध उचित पतों पर नोटिस भेजने की प्रार्थना की जा सकती है, विशेषकर जहाँ किसी शाखा के बंद होने या पता बदलने की आशंका हो। सेवा की प्रक्रिया स्थानीय MACT नियमों और अधिकरण के आदेश के अधीन रहेगी।

प्रारम्भिक आपत्ति की संभावना समझें: बीमा कंपनी को यदि याचिका में पार्टी-प्रतिवादी बनाया गया है, तो वह प्रारम्भ में क्षेत्राधिकार की आपत्ति ले सकती है। इसलिए मुद्दे को बाद में सुधारने के बजाय शुरुआत में ही विधिसम्मत मंच चुनें।

मामले के तथ्य छिपाएँ नहीं: दुर्घटना-स्थान, उपचार-स्थान, वास्तविक निवास और रोजगार के संबंध में विरोधाभासी दस्तावेज क्षेत्राधिकार की आपत्ति को मजबूत कर सकते हैं।

स्थानांतरण से होने वाली देरी से बचें: गलत MACT में दायर दावा स्थानांतरित हो सकता है। इससे साक्ष्य, सेवा, अंतरिम राहत और अंतिम मुआवजे में अनावश्यक विलंब होता है।

महत्वपूर्ण निर्णय

K. Rashik v. National Insurance Company Ltd. and Another, Civil Appeal No. 10706 of 2026, निर्णय दिनांक 16.09.2026, 2026 INSC 996.

अस्वीकरण

यह लेख सुप्रीम कोर्ट द्वारा मोटर दुर्घटना दावा प्रकरण में दिए गए निर्णय का लेखक का व्यक्तिगत कानूनी विश्लेषण एवं इंटरप्रिटेशन है। इस विषय पर विभिन्न विद्वान अधिवक्ताओं की अलग-अलग राय अथवा व्याख्या हो सकती है। लेखक इस लेख के आधार पर किए गए किसी निर्णय, कार्रवाई अथवा परिणाम के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं है। प्रत्येक प्रकरण के तथ्य, दस्तावेज एवं स्थानीय MACT व्यवस्था भिन्न हो सकती है; उचित विधिक परामर्श लेकर ही कार्रवाई करें।

लेखक / परामर्शदाता

Amardeep Jaiswal, Advocate High Court of Madhya Pradesh

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Disclaimer: This article is for educational purposes only and should not be considered legal advice.

अस्वीकरण: यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है और इसे कानूनी सलाह नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी कानूनी मामले के लिए कृपया उचित परामर्श लें।