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12 साल का कब्जा: मालिकाना हक कब बनता है? प्रतिकूल कब्जे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से समझें

12 साल का कब्जा: मालिकाना हक कब बनता है? प्रतिकूल कब्जे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से समझें

September 30, 2026


जमीन और मकान के विवादों में अक्सर कहा जाता है—“हम 12 साल से काबिज हैं, इसलिए अब मालिक हम हैं।” दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के **Mahnoor Fatima Imran v. M/s Visweswara Infrastructure Pvt. Ltd., 2025 INSC 646** निर्णय को देखकर कुछ लोग समझ रहे हैं कि लंबे कब्जे का कोई महत्व नहीं रहा।

कानूनी स्थिति इन दोनों धारणाओं से अलग है। **सिर्फ लंबे समय तक कब्जे में रहने से स्वामित्व नहीं मिलता। लेकिन सभी आवश्यक शर्तें पूरी करने वाला प्रतिकूल कब्जा—Adverse Possession—कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है।**

इस विषय में कब्जे की अवधि, उसका स्वरूप, मूल मालिक का अधिकार, भूमि की पहचान और लागू कानून एक साथ देखने पड़ते हैं।

## 1. 12 साल का नियम क्या है?

**परिसीमा अधिनियम, 1963 के अनुसूचीगत अनुच्छेद 65—Article 65—** में स्वामित्व के आधार पर अचल संपत्ति का कब्जा वापस पाने के वाद के लिए सामान्यतः 12 वर्ष की अवधि निर्धारित है। यह अवधि उस समय से चलती है, जब प्रतिवादी का कब्जा वादी के अधिकार के विरुद्ध प्रतिकूल होता है।

इसलिए अवधि केवल रजिस्ट्री की तारीख, मकान बनाने की तारीख या किसी व्यक्ति के वहाँ रहने की शुरुआत से तय नहीं होती। पहले साबित करना होगा कि कब्जा प्रतिकूल कब हुआ।

**धारा 27** इस नियम का महत्वपूर्ण परिणाम बताती है: संपत्ति का कब्जा वापस पाने का वाद संस्थित करने की वैधानिक परिसीमा समाप्त होने पर संबंधित व्यक्ति का उस संपत्ति में अधिकार भी समाप्त होता है। आवश्यक शर्तें पूरी करने वाला प्रतिकूल कब्जा इस प्रकार स्वामित्व का आधार बन सकता है। समय की गणना में लागू अपवाद और विशेष कानून भी देखे जाएंगे।

यह नियम प्रत्येक किरायेदारी, बेदखली या संपत्ति संबंधी कार्यवाही की समय-सीमा नहीं है; उन मामलों के अलग प्रावधान हो सकते हैं।

## 2. प्रतिकूल कब्जा सिद्ध करने के लिए क्या चाहिए?

दावा करने वाले को स्पष्ट अभिवचन और साक्ष्य से मुख्यतः यह दिखाना होगा:

- **वास्तविक कब्जा:** संपत्ति पर वास्तविक नियंत्रण हो; केवल कागजी दावा या कभी-कभार उपयोग पर्याप्त नहीं।
- **खुला कब्जा:** कब्जा छिपा हुआ न हो और उसका प्रतिकूल स्वरूप मालिक के ज्ञान में हो, अथवा परिस्थितियाँ ऐसी हों कि ज्ञान आरोपित किया जा सके।
- **निरंतर कब्जा:** आवश्यक वैधानिक अवधि तक कब्जे का प्रतिकूल स्वरूप बना रहा हो।
- **एकाधिकार वाला कब्जा:** कब्जा मूल मालिक को बाहर रखते हुए स्वयं मालिक की तरह किया जा रहा हो।
- **शांतिपूर्ण कब्जा:** कब्जे की प्रकृति खुली और स्थापित हो; बल या गोपनीयता पर आधारित दावा आवश्यक कसौटी पूरी नहीं करता।
- **प्रतिकूल मंशा:** कब्जा मालिक की अनुमति या उसके अधिकार के अधीन रहने के बजाय उसके अधिकार के विपरीत हो।

यहाँ **“hostile” का अर्थ लड़ाई, धमकी या हिंसा नहीं है।** इसका कानूनी अर्थ है—मूल मालिक के अधिकार के विपरीत स्वयं मालिक की तरह कब्जा रखना। केवल मालिक की निष्क्रियता भी पर्याप्त नहीं; दावेदार को प्रतिकूल कब्जा सिद्ध करना होगा।

## 3. कब्जाधारी स्वयं मुकदमा भी कर सकता है

सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने **Ravinder Kaur Grewal v. Manjit Kaur, (2019) 8 SCC 729** में स्पष्ट किया कि आवश्यक शर्तों से अर्जित प्रतिकूल कब्जे के अधिकार का उपयोग प्रतिवादी बचाव में और वादी अपने अधिकार की रक्षा के लिए कर सकता है।

इस आधार पर उपयुक्त परिस्थितियों में घोषणा, निषेधाज्ञा अथवा कब्जा-वापसी की राहत माँगी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने **Mukesh v. State of Madhya Pradesh, 2024 INSC 1026** में भी इस सिद्धांत का उल्लेख किया है।

लेकिन दावा करने की अनुमति और दावा साबित होना अलग बातें हैं। न्यायालय में स्पष्ट करना होगा कि किस संपत्ति पर, किसके विरुद्ध और कब से प्रतिकूल कब्जा रहा। विवाद होने पर न्यायालय अर्जित अधिकार की जाँच करता है; केवल “12 साल पूरे हुए” कहने से मामला सिद्ध नहीं होता।

## 4. किरायेदार, रिश्तेदार और सह-स्वामी की स्थिति

### अनुमति से मिला कब्जा

किरायेदार, लाइसेंसधारी, चौकीदार या मालिक की अनुमति से रहने वाला रिश्तेदार केवल समय बीतने से मालिक नहीं बन जाता।

यदि कब्जा पहले अनुमति से मिला था, तो बाद में उसका प्रतिकूल होना स्पष्ट रूप से सिद्ध करना होगा। यह बदलाव मालिक के ज्ञान में आया या नहीं और उसके बाद कितनी अवधि बीती—ये महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

पहले किराया देना, मालिक का अधिकार स्वीकार करना या उससे विक्रय-विलेख कराने की माँग करना महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। उनका प्रभाव तारीख और परिस्थितियों के अनुसार देखा जाएगा। “कभी अधिकार स्वीकार किया था, इसलिए भविष्य में प्रतिकूल कब्जे का दावा असंभव है”—यह कथन अत्यधिक व्यापक होगा।

**Rabindranath Panigrahi v. Surendra Sahu, 2025 INSC 333** में सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति से मिले कब्जे और अप्रमाणित प्रतिकूल कब्जे से संबंधित अधीनस्थ न्यायालयों के निष्कर्षों में अनुचित हस्तक्षेप को अस्वीकार किया।

### सह-स्वामी का कब्जा

एक सह-स्वामी का कब्जा सामान्यतः सभी सह-स्वामियों की ओर से माना जाता है। अकेले रहने या दूसरे सह-स्वामी को आय न देने से उसका अधिकार समाप्त नहीं होता।

इसके लिए **ouster—दूसरे सह-स्वामी के अधिकार का स्पष्ट बहिष्करण—**, उसकी जानकारी तथा अन्य आवश्यक तत्व सिद्ध करना पड़ते हैं। इसलिए सह-स्वामी को किरायेदार या लाइसेंसधारी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

## 5. अवधि कब से गिनी जाएगी?

लिखित रूप से मालिक का अधिकार नकारना, स्वतंत्र स्वामित्व का खुला दावा करना या परिस्थितियों सहित निर्माण और कब्जे का आचरण प्रासंगिक हो सकता है। लेकिन इनमें से कोई घटना अपने-आप अंतिम प्रमाण नहीं है।

**हर मामले में मालिक को लिखित नोटिस देना अनिवार्य नहीं है।** प्रतिकूल स्वरूप आचरण से भी सिद्ध हो सकता है। फिर भी उसके आरंभ, मालिक के ज्ञान और निरंतरता का ठोस आधार चाहिए।

पूर्वज या पूर्ववर्ती कब्जाधारी की अवधि कुछ परिस्थितियों में जोड़ी जा सकती है। लेकिन कब्जे की कानूनी निरंतरता, संबंधित व्यक्तियों का संबंध और उसी भूमि पर प्रतिकूल कब्जा सिद्ध करना आवश्यक है।

## 6. मुकदमे में स्पष्ट दावा और प्रमाण क्यों जरूरी हैं?

**Kishundeo Rout v. Govind Rao, 2025 INSC 956**, निर्णय दिनांक **8 अगस्त 2025**, में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट अभिवचन, मुद्दे और ठोस प्रमाण का महत्व दोहराया।

प्रतिकूल कब्जा तथ्य और कानून पर आधारित दावा है। सामान्यतः आवश्यक आधार मुकदमे की शुरुआत में रखना चाहिए; पर्याप्त अभिवचन, मुद्दे और प्रमाण के बिना इसे पहली बार अपील में उठाकर दूसरे पक्ष को आश्चर्य में नहीं डाला जा सकता। कुछ अपवाद पहले से मौजूद निर्विवाद तथ्यों और दूसरे पक्ष को होने वाली प्रतिकूलता के आधार पर हो सकते हैं।

इसलिए केवल पुरानी कर-रसीदें लगाने के साथ कब्जे का प्रतिकूल स्वरूप बताए बिना दावा करना पर्याप्त नहीं होगा।

## 7. Mahnoor Fatima निर्णय वास्तव में क्या कहता है?

**Mahnoor Fatima Imran & Ors. v. M/s Visweswara Infrastructure Pvt. Ltd. & Ors., 2025 INSC 646**, दिनांक **7 मई 2025**, में भूमि के राज्य में वैधानिक रूप से निहित होने, दस्तावेजों की श्रृंखला और वास्तविक कब्जे से संबंधित प्रश्न थे।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पंजीकरण मात्र से प्रत्येक दस्तावेज निर्विवाद रूप से वैध नहीं हो जाता। उस मामले में पूर्ववर्ती समझौतों और विक्रेता के अधिकार पर गंभीर संदेह था। पुराने अंतरिम आदेश भी वास्तविक भौतिक कब्जा साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं पाए गए।

**पैरा 25–28** के अनुसार, मामले की परिस्थितियों में अनुच्छेद 226 की असाधारण अधिकारिता में राहत अस्वीकार की गई। स्वामित्व और कब्जे पर टिप्पणियाँ प्रथमदृष्टया थीं; उपयुक्त दीवानी अथवा वैधानिक मंच पर पक्षकारों के अधिकारों का निर्णय खुला रखा गया।

इस निर्णय ने प्रतिकूल कब्जे का सिद्धांत समाप्त नहीं किया। इसका अर्थ यह भी नहीं कि हर विवादित स्वामित्व वाले मामले में रिट राहत पूरी तरह निषिद्ध है या पुराने कब्जाधारी को बलपूर्वक हटाया जा सकता है।

## 8. रजिस्ट्री और विक्रय-समझौते में अंतर

**संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 54** के अनुसार विक्रय-समझौता अपने-आप संपत्ति में स्वामित्व या हित उत्पन्न नहीं करता। पंजीकृत विक्रय-समझौता भी केवल इस कारण विक्रय-विलेख नहीं बन जाता।

इसी प्रकार केवल GPA स्वामित्व हस्तांतरण का विकल्प नहीं है। विधिसम्मत अधिकार रखने वाले व्यक्ति द्वारा वैध मुख्तारनामे से अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से किया गया उचित पंजीकृत हस्तांतरण अलग स्थिति है।

रजिस्ट्री महत्वपूर्ण है, लेकिन विक्रेता का अधिकार, दस्तावेज का स्वरूप, संपत्ति की पहचान और पूर्ववर्ती स्वामित्व-श्रृंखला की जाँच भी आवश्यक है।

## 9. निजी, सरकारी और स्थानीय निकाय की भूमि

| स्थिति | सामान्य परिसीमा-व्यवस्था |
|---|---|
| निजी भूमि पर स्वामित्व आधारित कब्जा-वापसी वाद | Article 65: कब्जा प्रतिकूल होने से 12 वर्ष |
| केंद्र अथवा राज्य सरकार द्वारा या उनकी ओर से वाद | Article 112: सामान्यतः 30 वर्ष |
| स्थानीय निकाय द्वारा सार्वजनिक सड़क या उसके हिस्से का कब्जा वापस लेने का वाद | Article 111: 30 वर्ष; बेदखली अथवा कब्जा छोड़ने की तारीख से |
| स्थानीय निकाय की अन्य भूमि | लागू कानून, स्वामित्व और वाद की प्रकृति की अलग जाँच |

नगरपालिका या पंचायत की हर संपत्ति पर Article 112 स्वतः लागू नहीं होता। नजूल या पट्टे की भूमि में वास्तविक स्वामित्व और पट्टे की शर्तें भी देखनी होंगी।

**Yerikala Sunkalamma v. State of Andhra Pradesh, 2025 INSC 383**, पैरा **87–88**, में सरकारी और निजी भूमि संबंधी अवधि तथा सरकारी भूमि के विरुद्ध दावे के कठोर परीक्षण का उल्लेख है।

**सरकारी जमीन पर 30 साल का सामान्य कब्जा भी अपने-आप मालिकाना हक नहीं देता।** प्रतिकूल कब्जे की आवश्यक शर्तों के साथ विशेष कानून और सार्वजनिक उपयोग की प्रकृति देखनी होगी।

## 10. कब्जे की सुरक्षा और स्वामित्व अलग प्रश्न हैं

स्थापित कब्जे की रक्षा के लिए हर मामले में 12 वर्ष पूरे होना आवश्यक नहीं है। किसी व्यक्ति की रजिस्ट्री होने मात्र से उसे कानून अपने हाथ में लेकर दूसरे को बेदखल करने का अधिकार नहीं मिलता।

**विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 6** में बिना सहमति और विधि की उचित प्रक्रिया के बाहर बेदखल किए गए व्यक्ति के लिए, आवश्यक शर्तों के अधीन, बेदखली से छह महीने के भीतर कब्जा-वापसी का विशेष उपचार है। इस धारा का वाद सरकार के विरुद्ध नहीं किया जा सकता। स्वामित्व आधारित अन्य उपचार अलग रह सकते हैं।

बेदखली की आशंका में उपयुक्त निषेधाज्ञा और बेदखली होने पर समय पर कब्जा-वापसी का उपचार देखना चाहिए। विशेष कानूनों में सक्षम प्राधिकारी की प्रक्रिया भी लागू हो सकती है।

## 11. पुरानी दीवार और पड़ोस की सीमा के विवाद में क्या करें?

किसी छोटे भू-भाग, रसोई, सीढ़ी या पुरानी दीवार का विवाद हो तो पहले भूमि की सही पहचान और स्वामित्व जाँचें। हिस्से का छोटा होना अपने-आप किसी पक्ष के अधिकार को समाप्त नहीं करता।

उपयोगी दस्तावेजों में शामिल हैं:

- दोनों पक्षों की रजिस्ट्री और पूर्ववर्ती स्वामित्व दस्तावेज।
- चौहद्दी, माप, क्षेत्रफल, स्वीकृत नक्शा और पुराने स्थल-नक्शे।
- पुरानी दीवार व निर्माण के फोटो, वीडियो और ध्वस्तीकरण से पहले के प्रमाण।
- कर, राजस्व और बिजली-पानी के अभिलेख।
- सक्षम सीमांकन या तकनीकी माप और पड़ोसी का स्वीकृत निर्माण-नक्शा।
- अनुमति, समझौते, नोटिस और कब्जे संबंधी पत्राचार।

पुरानी दीवार कब्जे या सीमा के समर्थन में साक्ष्य हो सकती है; उससे अकेले स्वामित्व तय नहीं होता। कर और राजस्व अभिलेख भी अपने-आप स्वामित्व नहीं देते। चौहद्दी और क्षेत्रफल में अंतर होने पर दस्तावेजों की समग्र व्याख्या तथा भूमि की पहचान आवश्यक है।

रजिस्ट्री से अधिकार सिद्ध करने का दावा और दूसरे के मूल अधिकार के विरुद्ध प्रतिकूल कब्जे का दावा अलग आधार हैं। वैकल्पिक दावा हो तो तथ्य और अवधि स्पष्ट रखें। स्थानीय निरीक्षण के लिए आयुक्त उपयोगी हो सकता है; अंतिम स्वामित्व का निर्णय न्यायालय करेगा।

## 12. दोनों पक्षों के लिए सावधानियाँ

**मालिक के लिए:** वास्तविक सीमा और कब्जा जाँचें, अतिक्रमण पर प्रमाण सुरक्षित करें, आवश्यक सीमांकन कराएं और उचित वाद समय पर संस्थित करें। अस्थायी अनुमति या लाइसेंस लिखित रखें। **केवल नोटिस या शिकायत भेजने से परिसीमा स्वतः रुकने की धारणा न रखें।**

**कब्जाधारी के लिए:** कब्जे का इतिहास, पूर्ववर्ती दस्तावेज और फोटो सुरक्षित रखें। अनुमति या समझौते सहित सभी तथ्य सही बताएं। कानूनी निष्कर्ष दस्तावेजों की जाँच के बाद निकालें। प्रतिकूल कब्जे की दलील तभी लें जब उसका तथ्यात्मक आधार हो। बेदखली या नुकसान की आशंका पर उपयुक्त राहत समय पर माँगें।

## निष्कर्ष

**लंबा कब्जा, प्रतिकूल कब्जा और स्वामित्व—इन तीनों का अंतर समझना आवश्यक है।** निजी भूमि में 12 वर्ष का नियम तभी निर्णायक हो सकता है जब कब्जे की प्रतिकूल प्रकृति और सभी आवश्यक तत्व सिद्ध हों तथा लागू वैधानिक अवधि पूरी हो।

Mahnoor Fatima निर्णय ने इस सिद्धांत को समाप्त नहीं किया। वह दस्तावेजों की वैधता और वास्तविक कब्जे को प्रमाणित करने की आवश्यकता बताता है। किसी संपत्ति-विवाद का सही आकलन दस्तावेज, भूमि की पहचान, कब्जे का स्वरूप और समय पर अपनाए गए कानूनी उपचार से होगा।

## अस्वीकरण

यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी और लेखक की विधिक समझ पर आधारित है। निर्णयों के अनुप्रयोग पर अन्य विद्वान अधिवक्ताओं की राय भिन्न हो सकती है। किसी वास्तविक मामले का परिणाम उसके तथ्यों, साक्ष्य, संबंधित कानून और न्यायालय के निर्णय पर निर्भर करेगा। यह लेख विशिष्ट कानूनी सलाह का विकल्प नहीं है। कार्रवाई से पहले संबंधित दस्तावेजों और परिसीमा की जाँच कराएं।

## प्रमुख संदर्भ

1. [परिसीमा अधिनियम, 1963—धारा 27 और संबंधित अनुच्छेद](https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/1565/5/A1963-36.pdf)।
2. Ravinder Kaur Grewal v. Manjit Kaur, (2019) 8 SCC 729, विशेषतः पैरा 60–62; [Mukesh v. State of Madhya Pradesh, 2024 INSC 1026 में संबंधित सिद्धांत](https://api.sci.gov.in/supremecourt/2021/3835/3835_2021_15_1506_58154_Judgement_20-Dec-2024.pdf)।
3. [Rabindranath Panigrahi v. Surendra Sahu, 2025 INSC 333](https://api.sci.gov.in/supremecourt/2022/29981/29981_2022_5_1501_59951_Judgement_06-Mar-2025.pdf)।
4. [Kishundeo Rout v. Govind Rao, 2025 INSC 956](https://api.sci.gov.in/supremecourt/2025/30361/30361_2025_8_10_63044_Judgement_08-Aug-2025.pdf), पैरा 19–20 और 29–30।
5. [Mahnoor Fatima Imran v. M/s Visweswara Infrastructure Pvt. Ltd., 2025 INSC 646](https://api.sci.gov.in/supremecourt/2023/53367/53367_2023_12_1504_61475_Judgement_07-May-2025.pdf), पैरा 16 और 25–28।
6. [Yerikala Sunkalamma v. State of Andhra Pradesh, 2025 INSC 383](https://api.sci.gov.in/supremecourt/2014/41129/41129_2014_13_1501_60392_Judgement_24-Mar-2025.pdf), पैरा 87–88।
7. [संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882—धारा 54](https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/14037/1/transfer_of_property_act8_%281%29.pdf)।
8. [विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963—धारा 6](https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/1583/7/A1963-47.pdf)।
9. [सह-स्वामित्व और ouster पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय दिनांक 9 फरवरी 2022](https://api.sci.gov.in/supremecourt/2013/5581/5581_2013_40_101_33218_Judgement_09-Feb-2022.pdf), पैरा 21–24।

लेखक / परामर्शदाता

Amardeep Jaiswal, Advocate High Court of Madhya Pradesh

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Disclaimer: This article is for educational purposes only and should not be considered legal advice.

अस्वीकरण: यह लेख केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है और इसे कानूनी सलाह नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी कानूनी मामले के लिए कृपया उचित परामर्श लें।