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28 October 2026
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बच्चों की यौन शोषण सामग्री देखना, रखना या साझा करना: POCSO में कानून

आम खोजों में child pornography कहा जाता है, लेकिन बच्चों की यौन शोषण सामग्री के लिए Child Sexual Exploitation and Abuse Material अर्थात CSEAM शब्द अधिक उपयुक्त है। यह सामान्य मनोरंजन सामग्री नहीं, बच्चे के शोषण और उसके प्रसार से जुड़ा विषय है। POCSO की धाराएँ 13 से 15 तथा IT Act की धारा 67B अलग प्रकार की संबंधित गतिविधियों को संबोधित करती हैं।
मुख्य बातें
  • कानूनी संदर्भ तारीख: 28 October 2026 सही शब्द और शुरुआती कानूनी स्थिति आम खोजों में child pornography कहा जाता है, लेकिन बच्चों की यौन शोषण सामग्री के लिए Child Sexual Exploitation and Abuse…
  • यह सामान्य मनोरंजन सामग्री नहीं, बच्चे के शोषण और उसके प्रसार से जुड़ा विषय है।
  • POCSO की धाराएँ 13 से 15 तथा IT Act की धारा 67B अलग प्रकार की संबंधित गतिविधियों को संबोधित करती हैं।

विस्तृत विवेचना

कानून और प्रक्रिया की समझ

कानूनी संदर्भ तारीख: 28 October 2026

सही शब्द और शुरुआती कानूनी स्थिति

आम खोजों में child pornography कहा जाता है, लेकिन बच्चों की यौन शोषण सामग्री के लिए Child Sexual Exploitation and Abuse Material अर्थात CSEAM शब्द अधिक उपयुक्त है। यह सामान्य मनोरंजन सामग्री नहीं, बच्चे के शोषण और उसके प्रसार से जुड़ा विषय है। POCSO की धाराएँ 13 से 15 तथा IT Act की धारा 67B अलग प्रकार की संबंधित गतिविधियों को संबोधित करती हैं। [1][3]

केवल यह कहना कि मैंने सामग्री बनाई नहीं थी या आगे नहीं भेजी, हर मामले में कानूनी बचाव नहीं है। कब्जा, नियंत्रण, उद्देश्य और संबंधित व्यवहार देखे जाते हैं। दूसरी ओर अचानक आए संदेश और जानबूझकर खोजकर सामग्री रखने की स्थितियों को बिना तथ्य जाँचे एक जैसा नहीं बताना चाहिए। सही प्रतिक्रिया सामग्री फैलाना नहीं, उचित प्राधिकरण को जानकारी देना है।

देखने और कब्जे का संबंध

Just Rights for Children Alliance बनाम S. Harish, 2024 INSC 716 में Supreme Court ने धारा 15 और ऑनलाइन सामग्री के संबंध में महत्वपूर्ण व्याख्या की। केवल अपने उपकरण में स्थायी डाउनलोड न होना हमेशा निर्णायक नहीं है। सामग्री पर नियंत्रण होने की स्थिति में constructive possession का प्रश्न उठ सकता है। लेकिन संबंधित धारा के आवश्यक तथ्य और मानसिक तत्व की जाँच बनी रहती है। [3]

इसलिए इंटरनेट पर मिला यह दावा कि सिर्फ देखना हमेशा पूरी तरह कानूनी है, भरोसेमंद नियम नहीं है। न ही हर अनचाहे लिंक को खोले बिना मिली सूचना से स्वतः वही अपराध साबित होता है। जाँच में संदेश का स्रोत, नियंत्रण, व्यवहार और डिजिटल रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो सकते हैं। वास्तविक व्यक्ति का मामला जाने बिना सार्वभौमिक दोष या छूट की घोषणा करना गलत है।

धारा 15 की अलग स्थितियाँ

धारा 15(1) में बच्चे से संबंधित सामग्री रखना या कब्जे में होना, निर्धारित रूप से हटाने, नष्ट करने या रिपोर्ट करने में चूक और साझा करने अथवा भेजने का आशय जुड़े हैं। पहली स्थिति में कम से कम पाँच हजार रुपये और दूसरे या बाद के अपराध में कम से कम दस हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है। सभी आवश्यक तत्व साथ पढ़े जाने चाहिए। [1]

धारा 15(2) वितरण, प्रदर्शन, प्रसार या भेजने के उद्देश्य से कब्जे या भंडारण से जुड़ी है; इसमें निर्धारित रिपोर्टिंग या अदालत के साक्ष्य संबंधी अपवाद भी हैं। सजा तीन वर्ष तक कारावास, जुर्माना या दोनों हो सकती है। धारा 15(3) व्यावसायिक उद्देश्य संबोधित करती है; पहली दोषसिद्धि में तीन से पाँच वर्ष, या जुर्माना, या दोनों और बाद की दोषसिद्धि में पाँच से सात वर्ष तथा जुर्माना है।

सामग्री भेजकर जागरूकता फैलाना सुरक्षित उपाय नहीं

किसी WhatsApp समूह, परिचित वकील के खुले ग्रुप या सोशल पोस्ट में वही फोटो या वीडियो भेजना बच्चे का शोषण और प्रसार बढ़ा सकता है। अपनी ओर से सबूत जुटाने के लिए नई सामग्री डाउनलोड न करें। रिपोर्ट में उपलब्ध URL, खाते का नाम, संदेश मिलने का समय और जरूरी संदर्भ बताएँ। वास्तविक फाइल के संबंध में सक्षम जाँच अधिकारी के सुरक्षित निर्देश लें। [1][2]

यदि उपकरण जाँच के लिए माँगा गया है या संरक्षण का निर्देश मिला है तो उसे अपने स्तर पर मिटाने या बदलने की कोशिश न करें। रिपोर्टिंग के साथ साक्ष्य संरक्षण कैसे करना है, इस पर अधिकारी से स्पष्ट मार्गदर्शन लें। सामग्री को दूसरों से सत्यापित कराने के नाम पर पुनः भेजना उचित नहीं है। प्लेटफॉर्म रिपोर्ट और पुलिस सूचना के रिकॉर्ड अलग सुरक्षित रखें।

परिवार और संस्थाएँ क्या करें

बच्चे की पहचान, स्कूल या परिवार संबंधी जानकारी प्रकाशित न करें। सामग्री हटाने के लिए संबंधित प्लेटफॉर्म की reporting सुविधा उपयोग करें और स्थानीय पुलिस अथवा SJPU को तथ्य दें। केवल पोस्ट हट जाने से पहले के अपराध की जाँच स्वतः समाप्त नहीं होती। बच्चे को दोष देने या उससे इंटरनेट पर वही सामग्री खोजवाने के बजाय सुरक्षा और आवश्यक सहायता की व्यवस्था करें। [1][2]

ऐसे मामले में विशेषज्ञ सलाह लेते समय स्पष्ट करें कि सामग्री अनचाही मिली, उपकरण में कहाँ उपलब्ध थी, किसे रिपोर्ट की गई और कोई जाँच निर्देश मिला है या नहीं। स्वयं विस्तृत डिजिटल जाँच न चलाएँ। कानून का उद्देश्य वास्तविक नियंत्रण और संबंधित गतिविधि की जाँच करते हुए शोषण रोकना है; सनसनीखेज प्रस्तुति, आगे प्रसार या निश्चित बचाव की ऑनलाइन सलाह अपनाना नहीं।

स्रोत

  1. Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012, amended text — NCPCR / Government of India. Definitions, offences, reporting, safeguards, Special Courts and presumptions; 2019 amendments included.
  2. POCSO Rules, 2020 — Gazette notification G.S.R. 165(E) — Ministry of Women and Child Development / NCPCR. Rules 3, 4, 6, 7 and 9: institutions, care, support, medical aid, legal aid and compensation.
  3. Just Rights for Children Alliance v. S. Harish, 2024 INSC 716 — official judgment summary — Supreme Court of India, Centre for Research and Planning. Entry dated 23 September 2024: section 15, control/constructive possession and section 30 foundational facts. The summary is explanatory and is not the judgment.

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Advocate Amardeep Jaiswal
लेखक के बारे में

Advocate Amardeep Jaiswal

Advocate, High Court of Madhya Pradesh, Jabalpur। भारतीय कानून, न्यायिक निर्णय और व्यावहारिक कानूनी विषयों पर जानकारीपूर्ण लेख प्रकाशित करते हैं।

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