Order XXI, Rules 97–101 CPC के तहत आवेदन नियमित वाद की तरह निर्णीत होता है। Rule 101 के तहत आने वाले प्रश्नों के लिए अलग दीवानी वाद दायर करने की आवश्यकता नहीं; प्रावधान ऐसे अलग वाद पर रोक लगाता है। संपत्ति के स्वामित्व के प्रश्न में मूल शीर्षक-दस्तावेज का महत्व कर-भुगतान की रसीदों से अधिक हो सकता है।
Court: The Supreme Court of India
Case Name: BALAKRISHNA(D) TR.LRS. VS. G.N.KANNIAH NAIDU (DEAD) THR. LRS.
Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 29808 of 2011
Case-number verification: विश्वसनीय मेटाडेटा में C.A. No. 13921/2026 दिया है, लेकिन निर्णय-पाठ में Civil Appeal संख्या रिक्त है और केवल SLP (C) No. 29808 of 2011 उल्लिखित है। इसलिए मेटाडेटा वाली अपील संख्या शामिल नहीं की गई है।
Bench: माननीय न्यायमूर्ति संजय कुमार और माननीय न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा
Neutral Citation: 2026 INSC 1155
Decision Date: 2026-10-26
मामला क्या था?
एक भूमि-साइट के संबंध में वादी ने 1987 में स्वामित्व, कब्जे और निषेधाज्ञा की मांग की। निचली अदालत ने वादी की Hakkupatra की केवल फोटोकॉपी पर भरोसा करते हुए स्वामित्व और कब्जे की डिक्री दी। निष्पादन के दौरान Balakrishna ने Order XXI, Rules 97–101 CPC के तहत दावा किया कि साइट उसे आवंटित हुई थी और वह उस पर मकान तथा दुकानें बनाकर काबिज था। उसके बेटे ने मूल Hakkupatra प्रस्तुत किया। निष्पादन न्यायालय और Karnataka High Court ने आवेदन खारिज किया; इसके विरुद्ध अपील माननीय सुप्रीम कोर्ट में आई।
मुख्य कानूनी प्रश्न
क्या निष्पादन कार्यवाही में Order XXI, Rules 97–101 CPC के तहत आवेदन करने वाला तीसरा पक्ष अपने अधिकार, स्वामित्व और कब्जे का निर्णय निष्पादन न्यायालय से प्राप्त कर सकता है; और क्या उसे अलग दीवानी वाद दायर करना चाहिए? साथ ही, संबंधित साक्ष्य में मूल आवंटन-पत्र और पक्षकार की स्वीकारोक्ति का क्या महत्व है?
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर निष्पादन न्यायालय और High Court के आदेश रद्द किए। Balakrishna के कानूनी प्रतिनिधियों को साइट का वैध स्वामी और कब्जेदार घोषित किया तथा 1987 के मूल वाद में पारित विपरीत निर्णय और डिक्री भी रद्द कर दी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि Order XXI, Rules 97–101 CPC के आवेदन का निपटारा नियमित वाद की तरह किया जाता है और Rule 101 अलग वाद दायर करने पर रोक लगाता है।
न्यायालय की प्रमुख reasoning
न्यायालय के अनुसार High Court की यह टिप्पणी कि निष्पादन न्यायालय का अधिकार-क्षेत्र सीमित है और आवेदक को अलग दीवानी वाद करना चाहिए, Order XXI के प्रावधानों के विपरीत थी। रिकॉर्ड में Balakrishna के पक्ष का मूल Hakkupatra था, जबकि डिक्री-धारक ने अपने मूल दस्तावेज के बजाय फोटोकॉपी पर भरोसा किया था। डिक्री-धारक ने गवाही में स्वीकार किया कि Balakrishna ने साइट पर पक्का मकान और तीन दुकानें बनाई थीं। न्यायालय ने यह भी कहा कि कर-भुगतान से अधिकतम कब्जे का अनुमान निकल सकता है, स्वामित्व का नहीं; इसलिए अनियमित कर-रसीदों को मूल शीर्षक-दस्तावेज पर वरीयता देना उचित नहीं था।
निर्णय के मुख्य बिंदु
- Order XXI, Rules 97–101 CPC के तहत आवेदन नियमित वाद की तरह निर्णीत होता है।
- Rule 101 के तहत आने वाले प्रश्नों के लिए अलग दीवानी वाद दायर करने की आवश्यकता नहीं; प्रावधान ऐसे अलग वाद पर रोक लगाता है।
- संपत्ति के स्वामित्व के प्रश्न में मूल शीर्षक-दस्तावेज का महत्व कर-भुगतान की रसीदों से अधिक हो सकता है।
- कर-भुगतान अपने-आप में स्वामित्व सिद्ध नहीं करता; उससे अधिकतम कब्जे का अनुमान निकल सकता है।
- यहां डिक्री-धारक की Balakrishna के निर्माण और कब्जे संबंधी स्वीकारोक्ति भी उसके दावे के आकलन में महत्वपूर्ण थी।
इस निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव
निष्पादन का विरोध करने वाले ऐसे तीसरे पक्ष को, जो संपत्ति पर स्वतंत्र अधिकार या कब्जे का दावा करता है, Order XXI, Rules 97–101 CPC के तहत अपने दावे का निर्णय उसी कार्यवाही में मांगना चाहिए। संबंधित न्यायालय को आवेदन और साक्ष्य का नियमित वाद की तरह परीक्षण करना होगा; ऐसे दावे को केवल यह कहकर टाला नहीं जा सकता कि निष्पादन न्यायालय का अधिकार-क्षेत्र सीमित है या अलग वाद दायर किया जाए।
Source check: निर्णय-पाठ में 'Non-reportable' लिखा है; इसलिए इसे reportable नहीं दर्शाया गया है।