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28 October 2026
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N. Arasappa बनाम State of Karnataka: धोखाधड़ी और स्वीकृत आवासीय योजना के अभाव में भूमि अधिग्रहण निरस्त

Land Acquisition Act की Section 3(f)(vi) के तहत सहकारी समिति की आवासीय योजना के लिए अधिग्रहण से पहले उपयुक्त सरकार की वास्तविक, पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। स्वीकृति केवल अधिग्रहित की जाने वाली भूमि की मात्रा या आवास योजना के सामान्य उल्लेख की नहीं, बल्कि योजना और विस्तृत लेआउट/ब्लूप्रिंट की होनी चाहिए। भूमि अधिग्रहण सुगम कराने के लिए निजी मध्यस्थों के साथ किए गए समझौते और उनसे जुड़े भुगतान, धोखाधड़ी या शक्ति के रंगीन प्रयोग के निष्कर्ष के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं। Court: The Supreme Court of India Case Name: N.ARASAPPA VS. STATE OF KARNATAKA . Case Number: Civil Appeal Nos. 13744-13747 of 2015, 13749-13752 of 2015, 13759-13762 of 2015, 13754-13757 of 2015 और 13753 of 2015 Bench: माननीय न्यायम…
legal.courtThe Supreme Court of India
legal.caseN.ARASAPPA VS. STATE OF KARNATAKA . Case Number: Civil Appeal Nos. 13744-13747 of 2015, 13749-13752 of 2015, 13759-13762 of 2015, 13754-13757 of 2015 और 13753 of 2015
legal.benchमाननीय न्यायमूर्ति J. B. Pardiwala और माननीय न्यायमूर्ति K. Vinod Chandran
legal.citation2026 INSC 1151 Decision
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  • Land Acquisition Act की Section 3(f)(vi) के तहत सहकारी समिति की आवासीय योजना के लिए अधिग्रहण से पहले उपयुक्त सरकार की वास्तविक, पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।
  • स्वीकृति केवल अधिग्रहित की जाने वाली भूमि की मात्रा या आवास योजना के सामान्य उल्लेख की नहीं, बल्कि योजना और विस्तृत लेआउट/ब्लूप्रिंट की होनी चाहिए।
  • भूमि अधिग्रहण सुगम कराने के लिए निजी मध्यस्थों के साथ किए गए समझौते और उनसे जुड़े भुगतान, धोखाधड़ी या शक्ति के रंगीन प्रयोग के निष्कर्ष के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं।

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Land Acquisition Act की Section 3(f)(vi) के तहत सहकारी समिति की आवासीय योजना के लिए अधिग्रहण से पहले उपयुक्त सरकार की वास्तविक, पूर्व स्वीकृति आवश्यक है। स्वीकृति केवल अधिग्रहित की जाने वाली भूमि की मात्रा या आवास योजना के सामान्य उल्लेख की नहीं, बल्कि योजना और विस्तृत लेआउट/ब्लूप्रिंट की होनी चाहिए। भूमि अधिग्रहण सुगम कराने के लिए निजी मध्यस्थों के साथ किए गए समझौते और उनसे जुड़े भुगतान, धोखाधड़ी या शक्ति के रंगीन प्रयोग के निष्कर्ष के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं।

Court: The Supreme Court of India

Case Name: N.ARASAPPA VS. STATE OF KARNATAKA .

Case Number: Civil Appeal Nos. 13744-13747 of 2015, 13749-13752 of 2015, 13759-13762 of 2015, 13754-13757 of 2015 और 13753 of 2015

Bench: माननीय न्यायमूर्ति J. B. Pardiwala और माननीय न्यायमूर्ति K. Vinod Chandran

Neutral Citation: 2026 INSC 1151

Decision Date: 2026-10-26

मामला क्या था?

कर्नाटक में एक सहकारी आवास समिति के लिए 1988-89 में भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू हुई। भूमि-मालिकों ने आरोप लगाया कि समिति ने भूमि अधिग्रहण को सुगम बनाने के लिए निजी पक्ष से समझौता किया था, जबकि सरकार के समक्ष विधिवत विस्तृत आवासीय योजना और लेआउट प्रस्तुत या अनुमोदित नहीं किए गए थे। कुछ भूमि-मालिकों ने 2007 में अधिग्रहण को चुनौती दी। उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने धोखाधड़ी और शक्ति के रंगीन प्रयोग के आधार पर अधिग्रहण निरस्त किया, लेकिन खंडपीठ ने देरी और पूर्व निर्णय के आधार पर उस आदेश को पलट दिया।

मुख्य कानूनी प्रश्न

क्या सहकारी आवास समिति के पक्ष में भूमि अधिग्रहण, बिना सरकार के समक्ष विधिवत रखी और पूर्व-अनुमोदित विस्तृत आवासीय योजना तथा लेआउट के, वैध हो सकता है; और क्या पहले के मुकदमे तथा देरी के आधार पर अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की जा सकती है, जबकि धोखाधड़ी और शक्ति के रंगीन प्रयोग से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य पहले न्यायालय के सामने नहीं आए थे?

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने खंडपीठ का निर्णय निरस्त कर एकल न्यायाधीश का आदेश बहाल किया और अधिग्रहण को धोखाधड़ी तथा शक्ति के रंगीन प्रयोग से दूषित पाया। सहकारी समिति की आवासीय योजना के लिए अधिग्रहण तभी सार्वजनिक प्रयोजन हो सकता है जब उपयुक्त सरकार पहले वास्तविक योजना को—जिसमें लेआउट और उसका विस्तृत खाका शामिल हो—अनुमोदित करे; केवल भूमि की मात्रा या प्रस्तावित प्रयोजन का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। इस मामले में देरी और res judicata के आधार पर चुनौती खारिज करना उचित नहीं था।

न्यायालय की प्रमुख reasoning

न्यायालय ने अधिग्रहण से पहले तीसरे पक्ष के साथ किए गए उस समझौते को महत्वपूर्ण माना जिसमें भूमि खरीदने और सरकारी अधिग्रहण की प्रक्रिया सुगम कराने की भूमिका तय थी। अभिलेखों में सरकार के समक्ष रखी गई विधिवत विस्तृत योजना और लेआउट का अभाव था; समिति और संबंधित सरकारी समितियों की जांच भी पर्याप्त नहीं थी। सरकारी फाइलों में मुआवजे के भुगतान और निजी भुगतानों से जुड़े विवरण, सदस्यता अभिलेखों की कमियां तथा G.V.K. Rao Committee की निष्कर्षात्मक सामग्री भी अधिग्रहण की प्रक्रिया पर संदेह को पुष्ट करती थी। पहले के निर्णय ने इन विशिष्ट तथ्यों की विस्तृत जांच नहीं की थी; इसलिए केवल पूर्व मुकदमे या देरी के आधार पर चुनौती रोकना उचित नहीं था।

निर्णय के मुख्य बिंदु

  • Land Acquisition Act की Section 3(f)(vi) के तहत सहकारी समिति की आवासीय योजना के लिए अधिग्रहण से पहले उपयुक्त सरकार की वास्तविक, पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।
  • स्वीकृति केवल अधिग्रहित की जाने वाली भूमि की मात्रा या आवास योजना के सामान्य उल्लेख की नहीं, बल्कि योजना और विस्तृत लेआउट/ब्लूप्रिंट की होनी चाहिए।
  • भूमि अधिग्रहण सुगम कराने के लिए निजी मध्यस्थों के साथ किए गए समझौते और उनसे जुड़े भुगतान, धोखाधड़ी या शक्ति के रंगीन प्रयोग के निष्कर्ष के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं।
  • जहां पहले की कार्यवाही में महत्वपूर्ण तथ्य और धोखाधड़ी के विशिष्ट आरोप न्यायालय के समक्ष नहीं आए थे, वहां पूर्व निर्णय और देरी अपने-आप नई चुनौती को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
  • अधिग्रहण के बाद कब्जा लेने की वैधानिक धारणा इस मामले में खंडनीय मानी गई; अभिलेखों और कब्जा-प्रक्रिया से जुड़े साक्ष्य का परीक्षण आवश्यक है।

इस निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव

अधिग्रहित भूमि का कब्जा संबंधित मूल भूमि-मालिकों को लौटाया जाएगा, चाहे उन्होंने स्वयं अधिग्रहण को चुनौती दी हो या नहीं। कब्जा लौटने पर भूमि-मालिक सरकार से प्राप्त मुआवजा, यदि कोई हो, बिना ब्याज के वापस करेंगे; निजी लेन-देन में मिली रकम की वापसी इस निर्देश से नहीं होगी। समिति का भूमि पर दावा नहीं रहेगा। यदि कोई भूमि-मालिक सरकारी मुआवजा लौटाने में असमर्थ या अनिच्छुक हो, तो संबंधित भूमि की नीलामी कर प्राप्त रकम का उपयोग पीड़ित-क्षतिपूर्ति के लिए किया जाएगा; नीलामी राजस्व अधिकारियों द्वारा न्यायिक अधिकारी की निगरानी में होगी।

Source check: निर्णय के आरंभ में K. Vinod Chandran, J. को लेखक न्यायाधीश बताया गया है, जबकि अंतिम हस्ताक्षर में J. B. Pardiwala और K. Vinod Chandran दोनों के नाम हैं। बेंच में अंतिम हस्ताक्षर के अनुसार दोनों न्यायाधीश शामिल किए गए हैं।

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Advocate Amardeep Jaiswal
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Advocate Amardeep Jaiswal

Advocate, High Court of Madhya Pradesh, Jabalpur। भारतीय कानून, न्यायिक निर्णय और व्यावहारिक कानूनी विषयों पर जानकारीपूर्ण लेख प्रकाशित करते हैं।

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