धारा 5(24)(m)(i) के तहत नीति-निर्माण प्रक्रिया में भागीदारी, संबंधित-पक्ष निर्धारण का आधार हो सकती है। इस प्रावधान के लिए धारा 29A(c) और (g) वाली ‘driving seat’ या सकारात्मक नियंत्रण की पूरी कसौटी आवश्यक नहीं; नीति और व्यवसाय को दिशा देने वाली भूमिका पर्याप्त हो सकती है। Debenture Holder के संबंधित-पक्ष पाए जाने पर, उसके हितों की रक्षा करने वाला Debenture Trustee भी उसी दावे के आधार पर CoC में शामिल नहीं हो सकता।
Court: The Supreme Court of India
Case Name: ECL FINANCE LTD. VS. ABHINAV MUKHERJEE
Case Number: Civil Appeal No. 6268 of 2022 एवं Civil Appeal No. 6273 of 2022; साथ में Contempt Petition (C) Nos. 730 एवं 731 of 2023
Bench: माननीय न्यायमूर्ति J. B. Pardiwala और माननीय न्यायमूर्ति K. Vinod Chandran
Neutral Citation: 2026 INSC 1159
Decision Date: 2026-10-27
मामला क्या था?
Saha Infratech Private Limited (SIPL) ने debentures जारी किए और ECL Finance से ऋण सुविधा ली। Palm Developers Private Limited ने इन लेन-देन के संबंध में गारंटर तथा सुरक्षा-प्रदाता की भूमिका निभाई। CIRP शुरू होने पर Debenture Trustee और ECL के दावों को CoC में शामिल किया गया। एक homebuyer ने उनके शामिल किए जाने पर आपत्ति की। NCLT और NCLAT ने उन्हें संबंधित-पक्ष मानकर CoC से बाहर रखने का निष्कर्ष दिया; इसके विरुद्ध अपीलें की गईं।
मुख्य कानूनी प्रश्न
क्या Debenture Holder/Lender के ऐसे संविदात्मक अधिकार, जो Corporate Debtor की नीति-निर्माण प्रक्रिया और परियोजना-व्यवसाय को दिशा देने में भूमिका देते हैं, उसे IBC की धारा 5(24)(m)(i) के तहत संबंधित-पक्ष बनाते हैं और धारा 21(2) के पहले परंतुक के अनुसार CoC में प्रतिनिधित्व, भागीदारी और मतदान से रोकते हैं; तथा क्या गारंटी का CIRP से पहले आह्वान न होना वित्तीय ऋण के दावे को रोकता है?
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें खारिज कीं और संबंधित-पक्ष के रूप में अपीलकर्ताओं को CoC में शामिल न करने के निष्कर्ष में हस्तक्षेप से इनकार किया। न्यायालय ने माना कि ECL के debenture और lending दस्तावेजों में दिए गए अधिकार तथा परियोजनाओं और व्यवसाय पर उसकी व्यापक निगरानी/दिशा देने वाली भूमिका, धारा 5(24)(m)(i) के लिए पर्याप्त थी। ECL के संबंधित-पक्ष होने के कारण उसके हितों का प्रतिनिधित्व करने वाला Debenture Trustee भी CoC में शामिल नहीं हो सकता था। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि गारंटी का CIRP से पहले आह्वान न होना अपने-आप में वित्तीय ऋण के दावे को अमान्य नहीं करता।
न्यायालय की प्रमुख reasoning
न्यायालय ने धारा 5(24)(m)(i) को धारा 21(2) के पहले परंतुक और धारा 21(6A) के साथ पढ़ा। उसने स्पष्ट किया कि संबंधित-पक्ष निर्धारण के लिए धारा 29A(c) और (g) में बताए गए ‘control’ की कठोर कसौटी—अर्थात कंपनी की driving seat में होना—लागू नहीं होती। यहाँ नीति तय करने और व्यवसाय को दिशा देने में भूमिका या ‘navigation’ पर्याप्त हो सकती है। दस्तावेजों में बजट पर स्वीकृति/संशोधन, प्रबंधन और प्रमुख कर्मचारियों से जुड़े अधिकार, बोर्ड में प्रतिनिधित्व तथा परियोजना-निर्माण और बिक्री से संबंधित व्यापक अधिकार थे। न्यायालय ने माना कि ये अधिकार केवल नकारात्मक या रोक लगाने वाले नियंत्रण तक सीमित नहीं थे। उसने यह भी पाया कि CIRP शुरू होने के बाद किया गया ऋण-असाइनमेंट संबंधित-पक्ष प्रतिबंध से बचने के लिए किया गया bona fide assignment नहीं था।
निर्णय के मुख्य बिंदु
- धारा 5(24)(m)(i) के तहत नीति-निर्माण प्रक्रिया में भागीदारी, संबंधित-पक्ष निर्धारण का आधार हो सकती है।
- इस प्रावधान के लिए धारा 29A(c) और (g) वाली ‘driving seat’ या सकारात्मक नियंत्रण की पूरी कसौटी आवश्यक नहीं; नीति और व्यवसाय को दिशा देने वाली भूमिका पर्याप्त हो सकती है।
- Debenture Holder के संबंधित-पक्ष पाए जाने पर, उसके हितों की रक्षा करने वाला Debenture Trustee भी उसी दावे के आधार पर CoC में शामिल नहीं हो सकता।
- गारंटी का CIRP शुरू होने से पहले आह्वान न होना, अपने-आप में धारा 5(8) के तहत वित्तीय ऋण के अस्तित्व को नहीं रोकता।
- CIRP शुरू होने के बाद किया गया असाइनमेंट, यदि संबंधित-पक्ष प्रतिबंध को निष्प्रभावी करने के उद्देश्य से हो और bona fide न हो, तो assignee को भी CoC से बाहर रखा जा सकता है।
इस निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव
IBC मामलों में CoC की सदस्यता पर विवाद होने पर केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि ऋणदाता ने औपचारिक रूप से कंपनी का नियंत्रण संभाला था या नहीं। Debenture deed, facility agreement, Articles of Association और सहायक दस्तावेजों में दिए अधिकारों की वास्तविक प्रकृति—विशेषकर नीति, बजट, प्रबंधन और परियोजना संचालन पर प्रभाव—की जाँच जरूरी है। गारंटी-आधारित दावे को केवल इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि CIRP से पहले गारंटी लागू नहीं की गई थी; फिर भी संबंधित-पक्ष होने पर CoC में भागीदारी अलग से निषिद्ध हो सकती है।