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28 October 2026
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POCSO केस की सुनवाई किस अदालत में होती है? Special Court की भूमिका

POCSO Act की धारा 28 के अनुसार राज्य सरकार High Court के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके प्रत्येक जिले के लिए Court of Session को Special Court के रूप में नामित करती है। उद्देश्य लैंगिक अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई में बच्चे की जरूरतों और शीघ्र प्रक्रिया को महत्व देना है। हर सामान्य अदालत, पुलिस कार्यालय या बाल कल्याण समिति POCSO की trial court नहीं होती।
मुख्य बातें
  • कानूनी संदर्भ तारीख: 28 October 2026 विशेष अदालत क्यों बनाई जाती है POCSO Act की धारा 28 के अनुसार राज्य सरकार High Court के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके प्रत्येक जिले के लिए Court of Ses…
  • उद्देश्य लैंगिक अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई में बच्चे की जरूरतों और शीघ्र प्रक्रिया को महत्व देना है।
  • हर सामान्य अदालत, पुलिस कार्यालय या बाल कल्याण समिति POCSO की trial court नहीं होती।

विस्तृत विवेचना

कानून और प्रक्रिया की समझ

कानूनी संदर्भ तारीख: 28 October 2026

विशेष अदालत क्यों बनाई जाती है

POCSO Act की धारा 28 के अनुसार राज्य सरकार High Court के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके प्रत्येक जिले के लिए Court of Session को Special Court के रूप में नामित करती है। उद्देश्य लैंगिक अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई में बच्चे की जरूरतों और शीघ्र प्रक्रिया को महत्व देना है। हर सामान्य अदालत, पुलिस कार्यालय या बाल कल्याण समिति POCSO की trial court नहीं होती। [1]

किस जिले में कौन सी अदालत नामित है, यह स्थानीय notification और केस के वर्तमान आवंटन से स्पष्ट होगा। केवल भवन पर fast track लिखा होना पर्याप्त पहचान नहीं है। FIR या charge-sheet के बाद केस नंबर, अदालत का नाम और अगली तारीख संबंधित अधिकारी अथवा वकील से लें। न्यायालयों में प्रशासनिक बदलाव होने पर सुनवाई का स्थान और roster भी बदल सकता है।

संज्ञान और साथ जुड़े अपराध

धारा 33(1) Special Court को संबंधित तथ्यों की शिकायत या पुलिस रिपोर्ट पर सीधे cognizance लेने की शक्ति देती है; सामान्य committal की प्रक्रिया आवश्यक नहीं रहती। धारा 28 कुछ साथ जुड़े अपराधों के संयुक्त trial तथा IT Act की धारा 67B के संबंधित मामलों की विशेष jurisdiction भी संबोधित करती है। लागू आरोप और एक साथ सुनवाई की कानूनी शर्तें वास्तविक रिकॉर्ड से देखी जाती हैं। [1]

इस व्यवस्था का अर्थ यह नहीं कि हर विवाद सीधे इसी अदालत में ले जाकर सामान्य पुलिस जाँच को हटाया जा सकता है। उपलब्ध remedy और सही आवेदन घटना, रिपोर्ट और procedural stage पर निर्भर करते हैं। पुलिस जाँच, CWC की देखभाल संबंधी भूमिका और Special Court का trial अलग कार्य हैं। परिवार को इन संस्थाओं की जिम्मेदारियों की अलग सूची रखनी चाहिए।

बच्चे के बयान के समय सुरक्षा

धारा 33 में बच्चे से पूछे जाने वाले सवाल अदालत के माध्यम से रखने, जरूरत पर breaks देने और भरोसे के व्यक्ति की उपस्थिति जैसी व्यवस्थाएँ हैं। बार बार testimony के लिए बुलाना, आक्रामक questioning और character assassination रोकने की जिम्मेदारी भी बताई गई है। धारा 36 बच्चे को आरोपी से सीधे exposed किए बिना बयान की व्यवस्था संबोधित करती है। [1]

साथ ही आरोपी को बयान सुनने और अपने वकील से संवाद की निष्पक्ष प्रक्रिया का अधिकार रहता है। screen, video conferencing या अन्य उपयुक्त साधन का प्रश्न अदालत तय करती है। परिवार सुरक्षा या संचार की जरूरत पहले बताए। सहायता का उद्देश्य बच्चे को सहजता से सच कहने देना है; किसी पक्ष को उत्तर रटवाने या जिरह के वैध प्रश्न पूरी तरह हटाने का अधिकार देना नहीं।

गोपनीय सुनवाई और विशेषज्ञ सहायता

धारा 37 के अनुसार trial in camera होता है। धारा 38 जरूरत के अनुसार interpreter, translator, special educator या विशेषज्ञ की सहायता संबोधित करती है। धारा 33(7) पहचान की गोपनीयता की विशेष सुरक्षा देती है। बच्चे की भाषा, disability, थकान या मनोवैज्ञानिक कठिनाई के बारे में पहले बताना उचित व्यवस्था कराने में मदद करता है। इन जरूरतों को सामान्य अनुशासन की समस्या न समझें। [1]

धारा 40 परिवार या अभिभावक को चुने हुए वकील की सहायता का अधिकार देती है और आर्थिक असमर्थता में Legal Services Authority की सहायता का प्रावधान है। Special Public Prosecutor और परिवार के वकील की भूमिकाएँ अलग हो सकती हैं। सहायता व्यक्ति भी कानूनी प्रतिनिधि का स्वतः विकल्प नहीं है। परिवार किससे कौन सी जानकारी माँगेगा, यह स्पष्ट रखने से भ्रम कम होता है।

समयसीमा, सहायता और प्रगति की निगरानी

धारा 35 में cognizance से तीस दिन के भीतर बच्चे का evidence लेने और विलंब के कारण लिखने का प्रावधान है। trial को जहाँ तक संभव हो cognizance से एक वर्ष में पूरा करना है। इसका अर्थ हर मामला निश्चित तारीख पर समाप्त होना या समय गुजरते ही आरोपी स्वतः बरी हो जाना नहीं है। देरी और उसके उपाय अलग कानूनी मूल्यांकन का विषय हैं। [1]

Rules के अनुसार अंतरिम compensation और पुनर्वास सहायता का प्रश्न भी उचित परिस्थितियों में उठाया जा सकता है। hearing diary में हर तारीख पर हुआ काम, अगला उद्देश्य और जरूरी दस्तावेज नोट करें। बच्चे की पढ़ाई और स्वास्थ्य की जरूरत अलग रखें। Special Court की उपयोगिता केवल तेजी नहीं, बल्कि सुरक्षा, निष्पक्ष परीक्षण और आवश्यक सहायता के साथ सुनवाई करना है। [2]

स्रोत

  1. Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012, amended text — NCPCR / Government of India. Definitions, offences, reporting, safeguards, Special Courts and presumptions; 2019 amendments included.
  2. POCSO Rules, 2020 — Gazette notification G.S.R. 165(E) — Ministry of Women and Child Development / NCPCR. Rules 3, 4, 6, 7 and 9: institutions, care, support, medical aid, legal aid and compensation.

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Advocate Amardeep Jaiswal
लेखक के बारे में

Advocate Amardeep Jaiswal

Advocate, High Court of Madhya Pradesh, Jabalpur। भारतीय कानून, न्यायिक निर्णय और व्यावहारिक कानूनी विषयों पर जानकारीपूर्ण लेख प्रकाशित करते हैं।

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