Section 31(7)(a) के तहत मध्यस्थ की pre-award interest देने की शक्ति पक्षकारों के विपरीत संविदात्मक समझौते से सीमित हो सकती है। “Or otherwise” को स्वतः उसके पहले के शब्दों तक सीमित नहीं किया जाएगा; ejusdem generis के लिए पहले विशिष्ट वर्ग का होना आवश्यक है। Clause 26 को pre-reference और pendente lite interest पर रोक के रूप में लागू किया गया।
Court: The Supreme Court of India
Case Name: MS SHARMA ENTERPRISES VS. NATIONAL BUILDING CONSTRUCTION CORPORATION
Case Number: Civil Appeal No. 13782 of 2026 (arising out of SLP (C) No. 17072 of 2026)
Bench: माननीय न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और माननीय न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली
Neutral Citation: 2026 INSC 1135
Decision Date: 2026-10-15
मामला क्या था?
Ms Sharma Enterprises ने NBCC के लिए flooring और cladding का उप-ठेका किया था। काम के मोर्चे उपलब्ध न होने और अनुबंध समाप्त किए जाने के विवाद के बाद मध्यस्थ ने कुछ दावे स्वीकार किए और उन पर pre-reference, pendente lite तथा post-award interest दिया। दिल्ली हाई कोर्ट ने Section 34 और Section 37 की कार्यवाही में Clause 26 के आधार पर pre-reference और pendente lite interest को हटाया, लेकिन मूल दावों और post-award interest को कायम रखा। अपीलकर्ता ने उस सीमित हस्तक्षेप को चुनौती दी।
मुख्य कानूनी प्रश्न
क्या संविदा की Clause 26 में “or otherwise” शब्दों से पक्षकारों ने Arbitration and Conciliation Act, 1996 की Section 31(7)(a) के अर्थ में ऐसा निषेध स्वीकार किया था, जो मध्यस्थ को pre-reference और pendente lite interest देने से रोकता है?
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज की। उसने माना कि Clause 26 का “or otherwise” केवल मासिक या अंतिम भुगतानों में देरी तक सीमित नहीं है; यह ब्याज के दावे की अन्य परिस्थितियों को भी समेटता है। इसलिए Section 31(7)(a) के अधीन मध्यस्थ pre-reference और pendente lite interest नहीं दे सकता था। मूल दावे और post-award interest पर हाई कोर्ट का निर्णय कायम रहा।
न्यायालय की प्रमुख reasoning
Section 31(7)(a) में pre-award interest की शक्ति “Unless otherwise agreed by the parties” के अधीन है और Section 28(3) के साथ पढ़ने पर मध्यस्थ को संविदा की शर्तों का पालन करना होता है। न्यायालय ने कहा कि ejusdem generis तभी लागू होता है जब सामान्य शब्दों से पहले कोई विशिष्ट वर्ग या genus हो। Clause 26 में अलग-अलग परिस्थितियाँ “or” से जोड़ी गई थीं और “or otherwise” को सीमित करने से उसका स्वतंत्र प्रभाव समाप्त हो जाता। न्यायालय ने इस भाषा को Sayeed Ahmed और Jaiprakash Associates में विचारित “any other respect whatsoever” जैसे व्यापक निषेध के समान माना। उसने pre-award interest और post-award interest के बीच Section 31(7)(a) तथा 31(7)(b) के तहत अंतर भी रेखांकित किया।
निर्णय के मुख्य बिंदु
- Section 31(7)(a) के तहत मध्यस्थ की pre-award interest देने की शक्ति पक्षकारों के विपरीत संविदात्मक समझौते से सीमित हो सकती है।
- “Or otherwise” को स्वतः उसके पहले के शब्दों तक सीमित नहीं किया जाएगा; ejusdem generis के लिए पहले विशिष्ट वर्ग का होना आवश्यक है।
- Clause 26 को pre-reference और pendente lite interest पर रोक के रूप में लागू किया गया।
- इस मामले में मूल दावे और post-award interest कायम रहे; हाई कोर्ट ने केवल pre-reference और pendente lite interest हटाया था।
इस निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव
मध्यस्थता-संबंधी अनुबंधों में ब्याज की शर्तें तय करते समय व्यापक अवशिष्ट शब्दों, जैसे “or otherwise”, का महत्व है। ऐसी भाषा pre-reference और pendente lite interest पर संविदात्मक रोक के रूप में लागू हो सकती है। इस निर्णय में मूल स्वीकृत दावे और post-award interest अप्रभावित रहे।