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17 October 2026
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धर्मांतरण से मुस्लिम पिछड़ा वर्ग की विशिष्ट समुदाय-सदस्यता स्वतः नहीं मिलती: तमिलनाडु का G.O. निरस्त

इस्लाम में धर्मांतरण अपने-आप Labbai या किसी अन्य अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदाय की सदस्यता सिद्ध नहीं करता। पूर्ववर्ती सामाजिक पिछड़ापन मात्र के आधार पर व्यक्ति को न…
legal.courtThe Supreme Court of India
legal.caseTHE SECRETARY TO GOVERNMENT, VS. SAMEER AHAMED N Case Number: SLP (C) No. 25507 of 2026
legal.benchमाननीय न्यायमूर्ति Prashant Kumar Mishra और माननीय न्यायमूर्ति Shree Chandrashekhar
legal.citation2026 INSC 1129 Decision
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  • इस्लाम में धर्मांतरण अपने-आप Labbai या किसी अन्य अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदाय की सदस्यता सिद्ध नहीं करता।
  • पूर्ववर्ती सामाजिक पिछड़ापन मात्र के आधार पर व्यक्ति को नए सामाजिक-धार्मिक संदर्भ में किसी अलग अधिसूचित वर्ग का सदस्य नहीं माना जा सकता।
  • आरक्षण का आधार संवैधानिक रूप से पहचाना गया वर्ग और उसके सदस्यों का प्रासंगिक साझा सामाजिक गुण है; व्यक्तिगत रूप से हस्तांतरित होने वाला लाभ नहीं।

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इस्लाम में धर्मांतरण अपने-आप Labbai या किसी अन्य अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदाय की सदस्यता सिद्ध नहीं करता। पूर्ववर्ती सामाजिक पिछड़ापन मात्र के आधार पर व्यक्ति को नए सामाजिक-धार्मिक संदर्भ में किसी अलग अधिसूचित वर्ग का सदस्य नहीं माना जा सकता। आरक्षण का आधार संवैधानिक रूप से पहचाना गया वर्ग और उसके सदस्यों का प्रासंगिक साझा सामाजिक गुण है; व्यक्तिगत रूप से हस्तांतरित होने वाला लाभ नहीं।

Court: The Supreme Court of India

Case Name: THE SECRETARY TO GOVERNMENT, VS. SAMEER AHAMED N

Case Number: SLP (C) No. 25507 of 2026

Bench: माननीय न्यायमूर्ति Prashant Kumar Mishra और माननीय न्यायमूर्ति Shree Chandrashekhar

Neutral Citation: 2026 INSC 1129

Decision Date: 2026-10-15

मामला क्या था?

प्रतिवादी Sameer Ahamed N. का जन्म हिंदू माता-पिता के यहां हुआ था। इस्लाम अपनाने और नाम बदलने के बाद उन्होंने “Muslim Labbai” समुदाय प्रमाणपत्र मांगा, लेकिन आवेदन यह कहते हुए अस्वीकार हुआ कि उन्होंने धर्म बदला है, जाति या समुदाय नहीं। उनकी याचिका लंबित रहते तमिलनाडु सरकार ने 09.03.2024 का G.O. जारी किया, जिसके तहत निर्दिष्ट पूर्ववर्ती पिछड़े समुदायों से इस्लाम में धर्मांतरित व्यक्तियों को सात अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदायों में प्रमाणपत्र देने की व्यवस्था की गई। उच्च न्यायालय ने G.O. को असंवैधानिक घोषित किया। राज्य की विशेष अनुमति याचिका माननीय सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की।

मुख्य कानूनी प्रश्न

क्या हिंदू सामाजिक व्यवस्था से इस्लाम में धर्मांतरित व्यक्ति अपने पूर्व धर्म की पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय या अनुसूचित जाति की स्थिति के आधार पर तमिलनाडु की अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदायों में से किसी एक का सदस्य और उससे जुड़ी आरक्षण सुविधा का पात्र बन सकता है; और क्या राज्य का G.O. ऐसा प्रमाणपत्र देने का आधार बना सकता है?

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

धर्मांतरण अपने-आप किसी व्यक्ति को तमिलनाडु की सात अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदायों में से किसी का सदस्य नहीं बनाता। पूर्व धर्म या समुदाय की पिछड़ापन-आधारित स्थिति को मात्र धर्मांतरण से नई धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था की किसी विशिष्ट अधिसूचित समुदाय-सदस्यता में नहीं बदला जा सकता। न्यायालय ने संबंधित G.O. को अस्थिरनीय माना और उच्च न्यायालय के निष्कर्ष में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए SLP खारिज की।

न्यायालय की प्रमुख reasoning

न्यायालय ने धार्मिक पहचान और किसी विशिष्ट सामाजिक समुदाय की सदस्यता में अंतर किया। धर्मांतरण धार्मिक संबद्धता बताता है, लेकिन अपने-आप किसी ऐतिहासिक रूप से गठित समुदाय—जैसे Labbai—की सदस्यता सिद्ध नहीं करता। आरक्षण किसी व्यक्ति के साथ चलने वाला हस्तांतरणीय लाभ नहीं, बल्कि संवैधानिक रूप से पहचाने गए वर्ग और उसके साझा सामाजिक आधार से जुड़ा है। G.O. ने पूर्ववर्ती समुदाय की स्थिति को नए मुस्लिम समुदाय की सदस्यता के लिए पर्याप्त मान लिया, जबकि उनके बीच आवश्यक सामाजिक और कानूनी संबंध स्थापित नहीं किया। न्यायालय ने यह भी कहा कि समुदाय प्रमाणपत्र मौजूदा स्थिति की घोषणा करता है, उसे बनाता नहीं; और निजी Jamath वैधानिक आरक्षण-पात्रता का अंतिम निर्धारण नहीं कर सकता। अनुसूचित जाति के संदर्भ में, निर्णय ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 के तहत इस्लाम अपनाने पर अनुसूचित जाति का दर्जा जारी न रहने का उल्लेख किया।

निर्णय के मुख्य बिंदु

  • इस्लाम में धर्मांतरण अपने-आप Labbai या किसी अन्य अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदाय की सदस्यता सिद्ध नहीं करता।
  • पूर्ववर्ती सामाजिक पिछड़ापन मात्र के आधार पर व्यक्ति को नए सामाजिक-धार्मिक संदर्भ में किसी अलग अधिसूचित वर्ग का सदस्य नहीं माना जा सकता।
  • आरक्षण का आधार संवैधानिक रूप से पहचाना गया वर्ग और उसके सदस्यों का प्रासंगिक साझा सामाजिक गुण है; व्यक्तिगत रूप से हस्तांतरित होने वाला लाभ नहीं।
  • समुदाय प्रमाणपत्र स्थिति की घोषणा करता है, उसे निर्मित या प्रदान नहीं करता।
  • वैधानिक आरक्षण-पात्रता का अंतिम निर्धारण जवाबदेह सार्वजनिक प्राधिकरण का कार्य है; निजी Jamath ऐसा बाध्यकारी निर्धारण नहीं कर सकता।

इस निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव

तमिलनाडु के संबंधित G.O. के आधार पर केवल धर्मांतरण और पूर्ववर्ती पिछड़े वर्ग की स्थिति दिखाकर सात अधिसूचित मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदायों में से किसी का प्रमाणपत्र पाने का मार्ग उपलब्ध नहीं रहेगा। प्रमाणपत्र जारी करने वाली सक्षम सार्वजनिक प्राधिकरण को लागू संवैधानिक और वैधानिक शर्तों के अनुसार समुदाय-सदस्यता तथा पात्रता तय करनी होगी; निजी धार्मिक निकाय का प्रमाणपत्र इस निर्धारण का विकल्प नहीं है।

Advocate Amardeep Jaiswal
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Advocate Amardeep Jaiswal

Advocate, High Court of Madhya Pradesh, Jabalpur। भारतीय कानून, न्यायिक निर्णय और व्यावहारिक कानूनी विषयों पर जानकारीपूर्ण लेख प्रकाशित करते हैं।

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