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पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) और सुप्रीम कोर्ट की 'रोमियो-जूलियट क्लॉज' पर ऐतिहासिक चर्चा
पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act, 2012) को बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बेहद सख्त प्रावधानों के साथ बनाया गया था। इस कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के कि…
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Advocate Amardeep Jaiswal
Advocate, High Court of Madhya Pradesh, Jabalpur
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- पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act, 2012) को बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बेहद सख्त प्रावधानों के साथ बनाया गया था।
- इस कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को 'बच्चा' माना जाता है और कानूनन उनकी आपसी सहमति (Consent) की कोई मान्यता नहीं होती।
- लेकिन वर्तमान समय में, किशोरों (Adolescents) के बीच आपसी सहमति से बनने वाले संबंधों में इस सख्त कानून के इस्तेमाल को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है, जिसे माननीय सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में रेखांक…
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पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act, 2012) को बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बेहद सख्त प्रावधानों के साथ बनाया गया था। इस कानून के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को 'बच्चा' माना जाता है और कानूनन उनकी आपसी सहमति (Consent) की कोई मान्यता नहीं होती।
लेकिन वर्तमान समय में, किशोरों (Adolescents) के बीच आपसी सहमति से बनने वाले संबंधों में इस सख्त कानून के इस्तेमाल को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है, जिसे माननीय सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में रेखांकित किया है।
क्या है 'रोमियो-जूलियट क्लॉज' (Romeo-Juliet Clause)?
पश्चिमी देशों (जैसे अमेरिका और यूके) के कानूनों में एक प्रावधान होता है जिसे "Romeo and Juliet Laws" कहा जाता है। यह क्लॉज तब लागू होता है जब दो किशोर (जैसे 16 और 17 वर्ष के) आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं और उनके बीच उम्र का फासला बहुत कम होता है। ऐसे मामलों में कानून लड़के को एक क्रिमिनल या बलात्कारी की तरह नहीं देखता, बल्कि उन्हें कड़ी जेल की सजा से राहत दी जाती है।
भारत के मूल पॉक्सो एक्ट में फिलहाल ऐसा कोई अपवाद या क्लॉज शामिल नहीं है, जिसके कारण आपसी सहमति के मामलों में भी किशोरों पर गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हो जाते हैं।
माननीय सुप्रीम कोर्ट की इस पर टिप्पणी और चिंता
हाल ही में एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां गंभीर यौन शोषण के मामलों में पॉक्सो एक्ट का सख्त होना बेहद जरूरी है, वहीं किशोरों के आपसी प्रेम संबंधों (Consensual Adolescent Relations) के मामलों में कानून को थोड़ा संवेदनशील होने की आवश्यकता है।
न्यायालय ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कानून का उद्देश्य किशोरों के भविष्य को बर्बाद करना या उन्हें गंभीर अपराधियों की श्रेणी में खड़ा करना नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने संसद (Parliament) से भी इस दिशा में विचार करने और कानून में आवश्यक संशोधन (Amendments) लाने की संभावना तलाशने को कहा है ताकि 'रोमियो-जूलियट क्लॉज' जैसे प्रावधानों पर विचार किया जा सके।
अधिवक्ताओं और समाज के लिए इसका निष्कर्ष
एक अधिवक्ता के रूप में, कानूनी दृष्टिकोण से यह समझना बेहद महत्वपूर्ण है कि जब तक कानून में औपचारिक संशोधन नहीं होता, तब तक पॉक्सो के सख्त प्रावधान लागू रहेंगे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के इस हालिया रुख से उन मामलों में बचाव पक्ष (Defense) को मजबूती मिलेगी जहां दोनों पक्षों की उम्र में बहुत कम अंतर है और संबंध पूरी तरह आपसी सहमति से बने थे।
यह न्यायिक समझ कानून और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ा और प्रगतिशील कदम है।
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Advocate Amardeep Jaiswal
Advocate, High Court of Madhya Pradesh, Jabalpur।
भारतीय कानून, न्यायिक निर्णय और व्यावहारिक कानूनी विषयों पर जानकारीपूर्ण लेख प्रकाशित करते हैं।
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