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22 October 2026
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Tejaram बनाम State of Rajasthan: रिश्वत मांगने के आरोप में PC Act की धारा 17A की पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं

धारा 17A का प्रयोग तभी होगा जब आरोप किसी सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्य में लिए गए निर्णय या की गई सिफारिश से संबंधित हो। रिश्वत मांगने का कथित कृत्य, जब आधिकारिक नि…
legal.courtThe Supreme Court of India
legal.caseTEJARAM VS. STATE OF RAJASTHAN Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 11709 of 2025
legal.benchमाननीय न्यायमूर्ति S.V.N. Bhatti और माननीय न्यायमूर्ति N.V. Anjaria
legal.citation2026 INSC 1147 Decision
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  • धारा 17A का प्रयोग तभी होगा जब आरोप किसी सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्य में लिए गए निर्णय या की गई सिफारिश से संबंधित हो।
  • रिश्वत मांगने का कथित कृत्य, जब आधिकारिक निर्णय या सिफारिश से असंबद्ध हो, धारा 17A के संरक्षण में नहीं आता।
  • धारा 17A सरकारी कर्मचारियों को सभी आपराधिक आरोपों से व्यापक या स्वतः लागू संरक्षण नहीं देती।

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धारा 17A का प्रयोग तभी होगा जब आरोप किसी सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्य में लिए गए निर्णय या की गई सिफारिश से संबंधित हो। रिश्वत मांगने का कथित कृत्य, जब आधिकारिक निर्णय या सिफारिश से असंबद्ध हो, धारा 17A के संरक्षण में नहीं आता। धारा 17A सरकारी कर्मचारियों को सभी आपराधिक आरोपों से व्यापक या स्वतः लागू संरक्षण नहीं देती।

Court: The Supreme Court of India

Case Name: TEJARAM VS. STATE OF RAJASTHAN

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 11709 of 2025

Case-number verification: विश्वसनीय मेटाडेटा में Crl.A. No. 4988/2026 दिया गया है, लेकिन निर्णय के शीर्षक में Criminal Appeal No. रिक्त है। इसलिए लेख में निर्णय-पाठ में दर्ज SLP संख्या का ही उपयोग किया गया है।

Bench: माननीय न्यायमूर्ति S.V.N. Bhatti और माननीय न्यायमूर्ति N.V. Anjaria

Neutral Citation: 2026 INSC 1147

Decision Date: 2026-10-16

मामला क्या था?

अपीलकर्ता पुलिस कांस्टेबल पर आरोप था कि उसने पुलिस अधीक्षक की ओर से ₹1.5 लाख की रिश्वत मांगी। उसके विरुद्ध PC Act के तहत FIR दर्ज हुई, अभियोजन की धारा 19 वाली स्वीकृति के बाद आरोपपत्र दाखिल हुआ और Trial Court ने धारा 7 के तहत आरोप तय किया। अपीलकर्ता ने दलील दी कि जांच से पहले धारा 17A की स्वीकृति नहीं ली गई थी। High Court ने उसकी revision याचिका खारिज की, जिसे चुनौती देने पर यह अपील आई।

मुख्य कानूनी प्रश्न

क्या PC Act की धारा 17A के तहत पूर्व स्वीकृति के बिना जांच शुरू होने से कार्यवाही तब अमान्य हो जाती है, जब सरकारी कर्मचारी पर रिश्वत मांगने का आरोप हो और वह आरोप उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में लिए गए किसी निर्णय या की गई सिफारिश से संबंधित न हो?

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 17A तभी लागू होती है जब आरोपित अपराध सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में लिए गए निर्णय या की गई सिफारिश से संबंधित हो। रिश्वत मांगने का आरोप, दिए गए तथ्यों में, ऐसे निर्णय या सिफारिश से जुड़ा नहीं था; इसलिए धारा 17A की पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं थी और उसके अभाव से कार्यवाही अमान्य नहीं हुई। अपील खारिज कर High Court का आदेश कायम रखा गया।

न्यायालय की प्रमुख reasoning

धारा 17A के पाठ के अनुसार, पूर्व स्वीकृति की शर्त का संबंध ऐसे अपराध से है जो सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों के निर्वहन में लिए गए निर्णय या की गई सिफारिश से जुड़ा हो। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए व्यापक या स्वतः लागू होने वाला संरक्षण नहीं है। इस मामले में रिश्वत मांगने का कथित कृत्य आधिकारिक कर्तव्यों से असंबद्ध था। न्यायालय ने यह भी कहा कि धारा 19 की स्वीकृति संज्ञान लिए जाने से पहले प्राप्त की गई थी; इस मामले में उसे देर से प्राप्त करने का पहलू मात्र अनियमितता था और उससे पूरी कार्यवाही निरस्त नहीं होती।

निर्णय के मुख्य बिंदु

  • धारा 17A का प्रयोग तभी होगा जब आरोप किसी सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्य में लिए गए निर्णय या की गई सिफारिश से संबंधित हो।
  • रिश्वत मांगने का कथित कृत्य, जब आधिकारिक निर्णय या सिफारिश से असंबद्ध हो, धारा 17A के संरक्षण में नहीं आता।
  • धारा 17A सरकारी कर्मचारियों को सभी आपराधिक आरोपों से व्यापक या स्वतः लागू संरक्षण नहीं देती।
  • इस मामले में धारा 17A की पूर्व स्वीकृति का अभाव आपराधिक कार्यवाही को दूषित नहीं करता।
  • धारा 19 की अभियोजन स्वीकृति संज्ञान से पहले प्राप्त होने पर, इस मामले के संदर्भ में उसकी कथित देरी को मात्र अनियमितता माना गया।

इस निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव

भ्रष्टाचार के मामलों में केवल यह तथ्य कि आरोपी सरकारी कर्मचारी है, धारा 17A की पूर्व स्वीकृति को अनिवार्य नहीं बनाता। जांच से पहले यह देखना होगा कि आरोपित कृत्य आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में लिए गए किसी निर्णय या की गई सिफारिश से वास्तव में संबंधित है या नहीं।

Advocate Amardeep Jaiswal
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Advocate Amardeep Jaiswal

Advocate, High Court of Madhya Pradesh, Jabalpur। भारतीय कानून, न्यायिक निर्णय और व्यावहारिक कानूनी विषयों पर जानकारीपूर्ण लेख प्रकाशित करते हैं।

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