मंदिर की सहायता या रखरखाव के लिए दी गई इनाम भूमि पर धारा 41 लागू हो सकती है; धारा 34(5) ऐसी भूमि को धारा 34 से बाहर रखती है। धारा 41(1) के तहत इनाम भूमि का उपहार शून्य है; सरकार या अन्य प्राधिकारी की मंजूरी से भी उसे वैध नहीं किया जा सकता। धारा 22-A के विपरीत पंजीकरण, उस लेन-देन को वैध नहीं बनाता जिसे लागू कानून शून्य घोषित करता है।
Court: The Supreme Court of India
Case Name: K. RAMALINGAM VS. GOVERNMENT OF TAMIL NADU REP. BY ITS SECRETARY
Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) Nos. 20051-20052 of 2019
Case-number verification: निर्णय-पाठ में Civil Appeal संख्या रिक्त है और मूल SLP (C) Nos. 20051-20052 of 2019 दिए गए हैं। विश्वसनीय मेटाडेटा में C.A. No. 13857-13858/2026 है; निर्णय-पाठ को प्राथमिकता दी गई है।
Bench: माननीय न्यायमूर्ति पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और माननीय न्यायमूर्ति आलोक अराधे
Neutral Citation: 2026 INSC 1144
Decision Date: 2026-10-16
मामला क्या था?
तमिलनाडु के कोडुमुडी गांव में नागापालयम मारियम्मन-पोन्नाचियम्मन मंदिर की 1 एकड़ 10 सेंट भूमि मंदिर के अस्थायी न्यासी ने 30.08.2017 को तलुक कार्यालय बनाने के उद्देश्य से राज्य सरकार को उपहार में दी। राज्य ने भूमि पर कार्यालय बनाया और उपहार-विलेख का बचाव किया। बाद में सरकार ने हलफनामे में स्वीकार किया कि भूमि मंदिर को उसकी सहायता एवं रखरखाव के लिए दी गई इनाम भूमि है। मद्रास उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी थी; भक्तों की अपील पर मामला माननीय सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया।
मुख्य कानूनी प्रश्न
क्या मंदिर की सहायता और रखरखाव के लिए दी गई इनाम भूमि का अस्थायी न्यासी राज्य को उपहार कर सकता है; और भूमि पर बने सरकारी कार्यालय के लिए पट्टे तथा उचित किराये पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायालय ने माना कि भूमि Tamil Nadu Hindu Religious and Charitable Endowments Act, 1959 की धारा 41 के अधीन इनाम संपत्ति है। धारा 41(1) के तहत ऐसी भूमि का उपहार शून्य है और उपहार को बाद में कोई मंजूरी देकर वैध नहीं किया जा सकता। उपहार-विलेख का पंजीकरण भी Registration Act, 1908 की तमिलनाडु में लागू धारा 22-A के विपरीत और कानूनी प्रभाव से रहित था। हालांकि, पहले से बने तलुक कार्यालय को देखते हुए राज्य के पक्ष में पट्टा रद्द नहीं किया गया; किराया ₹31,000 प्रतिमाह किया गया।
न्यायालय की प्रमुख reasoning
धारा 34(5) इनाम संपत्ति को धारा 34 के दायरे से बाहर रखती है, इसलिए इस भूमि पर धारा 41 लागू हुई। धारा 41 उपहार को निषिद्ध करती है और सरकार को भी उपहार के लिए मंजूरी देने का अधिकार नहीं देती। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यासी पर संपत्ति का सावधानीपूर्वक और न्यास के हित में प्रबंधन करने का दायित्व है; राज्य मंदिर-संपत्ति का संरक्षक और नियामक है, उसका मालिक नहीं। वैकल्पिक रूप से, यदि धारा 34 लागू होती, तब भी आवश्यक मंजूरी और प्रक्रिया के अभाव में उपहार अमान्य होता।
निर्णय के मुख्य बिंदु
- मंदिर की सहायता या रखरखाव के लिए दी गई इनाम भूमि पर धारा 41 लागू हो सकती है; धारा 34(5) ऐसी भूमि को धारा 34 से बाहर रखती है।
- धारा 41(1) के तहत इनाम भूमि का उपहार शून्य है; सरकार या अन्य प्राधिकारी की मंजूरी से भी उसे वैध नहीं किया जा सकता।
- धारा 22-A के विपरीत पंजीकरण, उस लेन-देन को वैध नहीं बनाता जिसे लागू कानून शून्य घोषित करता है।
- राज्य मंदिर-संपत्ति का संरक्षक है, मालिक नहीं; सरकारी सुविधा या प्रशासनिक जरूरत अपने-आप मंदिर की भूमि के मुफ्त हस्तांतरण को उचित नहीं ठहराती।
- राज्य के पक्ष में पट्टा जारी रहेगा, लेकिन किराया ₹31,000 प्रतिमाह से कम नहीं होगा और हर तीन वर्ष में पुनर्निर्धारित किया जाएगा।
इस निर्णय का व्यावहारिक प्रभाव
मंदिर की इनाम भूमि के उपहार को शून्य घोषित किया गया और भूमि मंदिर की संपत्ति मानी गई। राज्य के पक्ष में पट्टा जारी रहेगा, लेकिन किराया 08.03.2019 से ₹31,000 प्रतिमाह होगा; पहले से दिए गए भुगतान का समायोजन करके बकाया तीन महीने में चुकाना होगा। किराया हर तीन वर्ष में पुनर्निर्धारित होगा और ₹31,000 प्रतिमाह से कम नहीं हो सकता। पट्टे की अवधि, नवीनीकरण और अन्य शर्तें मंदिर न्यास द्वारा कानून के अनुसार, मंदिर के हित को प्राथमिकता देकर तय की जाएंगी।
Source check: निर्णय-पाठ में शीर्षक पर REPORTABLE अंकित है। उसमें Civil Appeal संख्या रिक्त है और SLP (C) Nos. 20051-20052 of 2019 दिए गए हैं; मेटाडेटा का C.A. No. 13857-13858/2026 निर्णय-पाठ से मेल नहीं खाता।